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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, देश के मशहूर अर्थशास्त्री डा. अशोक गुलाटी की सलाह है कि जो लोग देश में सरकार से मुफ्त में राशन हासिल करते हैं उनकी सार्वजनिक पहचान के लिए उनके घर को लाल रंग से पोत देना चाहिए, इस पर आपकी क्या राय है?’ हमने कहा, ‘जब मोदी सरकार देश के 80 करोड़ लोगों को अपनी मर्जी से फ्री राशन दे रही है तो अर्थशास्त्री गुलाटी को बीच में कुलाटी मारने की क्या जरूरत थी? समाज के गरीब कमजोर वर्ग के लिए ऐसी कल्याणकारी योजनाएं चलानी पड़ती हैं।
दुनिया के अनेक देशों में भूखे और बेरोजगार युवा सड़कों पर बड़ी तादाद में आकर विरोध प्रदर्शन और आंदोलन करने लगते हैं। पेट भर जाए तो कोई आंदोलन नहीं करता। शांति बनी रहती है। इसलिए सरकार ने दूरदर्शिता के साथ यह योजना बनाई है।
ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सोमालिया में क्या हुआ, आप जानते हैं। फ्रांस में जब 14वें लुई की हुकूमत थी तब भीषण अकाल पड़ा था। हजारों भूखे लोगों की भीड़ राजमहल के सामने आकर चिल्लाने लगी तब वहां की रानी मेरी एंतोनेत ने मंत्री से पूछा कि ये लोग शोर क्यों मचा रहे हैं? मंत्री ने जवाब दिया कि ये लोग भूखे हैं और रोटी मांग रहे हैं। इस पर जनता की व्यथा से अनजान मूर्ख रानी ने कहा, इन लोगों से कहो कि रोटी नहीं मिलती तो केक खाएं।
‘ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज गुलाटी ने यह नहीं सोचा कि मुफ्त राशन पाने वालों के मकानों को लाल रंग से रंगने पर कितना खर्च आएगा? मकान लाल रंगो या भगवा इससे मुफ्त राशन पानेवाले 4 मंजिला मकान के मालिक भी नहीं शरमाएंगे।
कहते हैं कि बेशर्म की पीठ पर झाड़ ऊग आया। उसने शरमाने की बजाय कहा कि अच्छा हुआ इससे हवा मिलती रहेगी। मुफ्तखोरी की आदत को नेताओं ने बढ़ावा दिया है। इसके पीछे वोट बैंक बढ़ाने की राजनीति है।
महाराष्ट्र में तो पुरुषों ने भी लाड़की बहीण योजना का लाभ उठाया। सरकारी नौकरीवाली महिलाओं ने भी इसका फायदा लिया।’ हमने कहा, ‘महारष्ट्र की नहीं, राष्ट्र की बात कीजिए, गुलाटी ने कहा कि टैक्स देनेवालों के पैसे से लोगों को मुफ्त अनाज देकर आलसी बनाया जा रहा है। यह राशन उन्हीं लोगों को दिया जाना चाहिए जिन्हें इसकी वास्तव में जरूरत है।
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जब मकान पर लाल रंग लगाया जाएगा तो वे लोग मुफ्त राशन लेना छोड़ देंगे जो सामर्थ्यवान हैं।’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, जिसे मुफ्त का चंदन घिसने की आदत पड़ गई है, वह अपनी आदत से बाज नहीं आएगा। लोकतंत्र के लिए चुनाव चाहिए और चुनाव के लिए वोट ! बोट के लिए मुफ्त की रेवड़ी बांटनी पड़ती है।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






