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नवभारत डेस्क: कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मैसुरू शहरी विकास प्रधिकरण (एमयूडीए) से जुड़े कथित भूमि आवंटन घोटाले में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला तीन सामाजिक कार्यकताओं टीजे अब्राहम, प्रदीप और स्नेहमयी कृष्णा की शिकायत पर आधारित है। राज्यपाल ने इससे पहले यह शिकायत मिलने पर 26 जुलाई को मुख्यमंत्री को कारण बताओ नोटिस भी भेजा था, सिद्धारमैया ने 3 अगस्त को भेजे अपने जवाब में सभी आरोपों को गलत बताया था।
यही नहीं, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अध्यक्षता में हुई प्रदेश कैबिनेट की बैठक में भी इन आरोपों को नकारते हुए राज्यपाल से मुकदमे की मंजूरी न देने को कहा गया था। मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है और इस मामले में कानूनी व राजनीतिक लड़ाई का ऐलान किया है। गहलोत ने मुकदमे की मंजूरी देने के अपने फैसले के पक्ष में कानून के कई प्रावधानों के साथ ही मध्य प्रदेश से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच की रूलिंग का भी हवाला दिया है।
हो सकता है कि कानूनी रूप से गहलोत ठीक हों, लेकिन भाजपा नीत केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल जिस तरह से काम कर रहे हैं, वह अनेक सवाल खड़े करता है। विपक्षी दल तो राज्यपालों पर खुलकर केंद्र के एजेंट के तौर पर काम करने का आरोप लगाते ही रहे हैं। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भूमिका पर तो सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी भी की थी।
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पंजाब और केरल की सरकारें भी राज्यपाल की भूमिका से परेशान हैं। यही वजह है कि अनेक बार राज्यपाल का पद ही समाप्त करने की मांग विपक्ष की ओर से होती रहती है। केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार का दावा है कि उसने पिछले 10 सालों एक बार भी अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल नहीं किया है, लेकिन इसके बावजूद यह भी सच है कि उसने जनमत के खिलाफ जाकर अनेक चुनी हुई सरकारों को सत्ता से बेदखल करके भाजपा या साथी दलों के साथ मिलकर सरकार भी बनाई ऐसे सभी मामलों में राज्यपालों की भूमिका पर हमेशा ही अंगुली उठी है।
केंद्र में किसी भी एक दल की हमेशा सरकार नहीं रहेगी। इसलिए अब उचित समय है कि राज्यपालों की भूमिका का सही से मूल्यांकन किया जाए और यह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए कि राज्यपालों की कहां पर भूमिका होगी और कहां पर नहीं? इसके लिए सता और विपक्ष को मिलकर नियम बनाने चाहिए। यह राज्यों की स्वायत्ता से जुड़ा मुद्दा है और लोकतंत्र की मजबूती के लिए अत्यंत जरूरी भी है।
लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा






