नवभारत विशेष: गणतंत्र दिवस पर यूरोप को विशेष महत्व

India EU Relations: ईयू नेताओं को गणतंत्र दिवस पर बुलाना अमेरिका-विरोध नहीं, बल्कि भारत की डाइवर्सिफिकेशन नीति का संकेत है। यह आर्थिक कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता की हाई-प्रोफाइल अभिव्यक्ति है।
Navbharat Special: Europe given special importance on Republic Day.
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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नवभारत डिजिटल डेस्क: वास्तव में यह संदेश 'अमेरिका-विरोध' का नहीं बल्कि डाइवर्सिफिकेशन का है। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र कई वर्षों से रहा है-स्ट्रेटजिक ऑटोनोमी यानी किसी एक ध्रुव पर निर्भर न होना। ईयू नेताओं को गणतंत्र दिवस पर बुलाना, यही बताता है कि भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है- अमेरिका के साथ रक्षा/टेक/इंडो-पैसिफिक सहयोग।

रूस के साथ ऊर्जा ऐतिहासिक रक्षा संबंध। खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा/निवेश और ईयू के साथ व्यापार तकनीक मानक-निर्धारण, यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा केवल हथियारों की नहीं रही; अब मुकाबला है-टैरिफ, सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, एआई नियम, डेटा गवर्नेस, ग्रीन-टेक और कार्बन टैक्स जैसी चीजों का।

ईयू इन सबमें नियम और मानक तय करने वाली महाशक्ति है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के व्यापार सचिव ने कहा है कि ईयू के साथ अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता हो सकता है। गणतंत्र दिवस का निमंत्रण केवल 'सांस्कृतिक सम्मान' नहीं; यह आर्थिक कूटनीति की हाई प्रोफाइल पैकेजिंग है। जिसमें परेड का प्रतीकात्मक मंच व शिखर सम्मेलन की ठोस डील शामिल है।

सवाल है क्या यह अमेरिका की नाराजगी की भरपाई है? दुनिया अब 'टैरिफ युग' में लौट रही है और बड़े देश अपने हितों के लिए दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। भारत किसी एक मार्केट के भरोसे नहीं बैठना चाहता। अगर अमेरिकी बाजार/ट्रेड में अनिश्चितता बढ़ती है, तो ईयू-जो खुद दुनिया का सबसे बड़ा समृद्ध बाजार समूह है-एक वैकल्पिक इंजन बन सकता है। हम इसे रिस्क इंश्योरेंस कह सकते हैं।

भारत की शानदार कूटनीति

आगामी 26 जनवरी को भारत द्वारा अपने 77 वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन को मुख्य अतिथि बनाना केवल एक औपचारिक राजनयिक घटना भर नहीं है। यह एक रणनीतिक संदेश है और वह भी तब जब वैश्विक व्यापार, सप्लाई चेन और सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। दोनों नेता 25-27 जनवरी 2026 की स्टेट विजिट पर आएंगे और 27 जनवरी को 16 वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी करेंगे।

इस फैसले का अमेरिका, चीन, रूस, खाड़ी-सभी के लिए अलग-अलग संदेश निकलता है। जहाँ तक अमेरिका के लिए संदेश की बात है तो भारत साफ कह रहा है-हम आपके साझेदार हैं, लेकिन एक्सक्लूसिव कैंप में नहीं। अगर व्यापार/टैरिफ पर दबाव आएगा, तो भारत के पास विकल्प हैं। यह 'सॉफ्ट वैलेंसिंग' है-बिना खुले विरोध के।

इसी तरह इसमें चीन के लिए भी संदेश है। ईयू आज 'चीन से जोखिम मुक्त' की बात करता है-यानी सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता को घटाना। ऐसे में भारत का ईयू के साथ उठना-बैठना चीन को यह बताता है कि 'ईयू-भारत धुरी' सप्लाई चेन में चीन का विकल्प बनने की कोशिश कर सकता है।

इस सबमें सिर्फ भारत के लिए ही फायदा नहीं है यूरोप के लिए भी इसमें 'विनिंग शॉट' है, क्योंकि यूरोप को भारत से इसमें 4 बड़े फायदे दिखते हैं। यूरोप को इसमें भारत का ग्रोथ मार्केट दीखता है यानी विशाल उभरता बाजार। इसलिए ईयू भारत के साथ लंबे समय से मुक्त व्यापार समझौता चाहता है। इसके अलावा इसमें सप्लाई चेन का विविधीकरण भी है।

कोविड के बाद यूरोप को वैकल्पिक सप्लाई चेन चाहिए, यूरोप के लिए तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है-ईयू-इंडिया ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (टीटीसी) जो इस सहयोग का महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। भारत के लिए ईयू भी 3 क्षेत्रों में गेम चेंजर हो सकता है- 1-एक्सपोर्ट मार्केट बढ़ेगा-टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो कंपोनेंट, इंजीनियरिंग गु आदि। 2-सीधा विदेशी निवेश / टेक ट्रांसफर-मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन-टेक में।

3- नियम/मानक-ईयू का नियामक शक्ति बहुत बड़ा है, भारत इसमें साझेदारी करके अपने निर्यात को फायदा दिला सकता है। एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन को 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि बनाना भारत का स्पष्ट संदेश है कि वह 2026 के अनिश्चित वैश्विक माहौल में ईयू को रणनीतिक-आर्थिक - साझेदार के रूप में ऊँची - प्राथमिकता दे रहा है।

लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा

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