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नवभारत संपादकीय: पूर्व न्यायाधीशों ने लिया सुदर्शन रेड्डी का पक्ष
- Written By: आंचल लोखंडे
Navbharat Editorial: यद्यपि दोनों प्रत्याशी दक्षिण भारत के हैं लेकिन एक का संघ विचारधारा से जुड़ाव है तो दूसरा कानून विशेषज्ञ है। बीजेपी ने अपने प्रत्याशी का चयन तमिल अस्मिता से जोड़ दिया है।

पूर्व न्यायाधीशों ने लिया सुदर्शन रेड्डी का पक्ष (सौजन्यः सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: यह पहला मौका है जब 20 पूर्व न्यायाधीशों के समूह ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को आड़े हाथ लिया। विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी तथा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी के बारे में टिप्पणी करते हुए गत सप्ताह शाह ने आरोप लगाया था कि उन्होंने नक्सलवाद का समर्थन कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को आघात पहुंचाया था। शाह ने कहा था कि जस्टिस सुदर्शन ने 2011 के अपने फैसले में सल्वा जुडुम को गैरकानूनी करार देकर नक्सलियों की मदद की थी। छत्तीसगढ़ की तत्कालीन रमन सिंह के नेतृत्ववाली बीजेपी सरकार ने आदिवासियों को ट्रेनिंग देकर सल्वा जुडुम नामक संगठन बनाया था और उन्हें नक्सलियों से लड़ने के लिए तैयार किया था। पूर्व न्यायाधीशों के इस समूह में सुप्रीम कोर्ट के 7 पूर्व जज शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अभियान वैचारिक हो सकता है लेकिन इसे शालीनता और गरिमा के साथ चलाया जा सकता है। किसी भी उम्मीदवार की तथाकथित विचारधारा की आलोचना करने से बचना चाहिए। शाह का बयान यह संकेत देने वालाथा कि सुदर्शन रेड्डी नक्सलियों के प्रति झुकाव या नरम रवैया रखते हैं। दूसरी ओर यह तथ्य अपनी जगह है किसल्वा जुडुम के नाम पर विशेष पुलिस अधिकारी का दर्जा दिए गए आदिवासी बड़ी तादाद में मारे जा रहे थे क्योंकि प्रशिक्षित और घातक शस्त्रों वाले नक्सलियों के सामने वह मुठभेड़ में टिक नहीं पा रहे थे। न्या। सुदर्शन रेड्डी ने सारे पहलुओं को ध्यान में रखकर सलवा जुडुम को अवैध संगठन घोषित किया था। पूर्व न्यायाधीशों के समूह ने लिखित संयुक्त वक्तव्य में कहा कि किसी उच्च राजनीतिक हस्ती द्वारा न्यायालय के फैसले की पूर्वाग्रहयुक्त गलत व्याख्या से न्यायाधीशों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
सुदर्शन रेड्डी का फैसला नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन नहीं करता है। लोग मानते हैं कि रेड्डी उदारमतवादी हैं तथा न्यायदान करते समय उन्होंने नागरी स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्य व नैतिकता का ध्यान रखा। बीजेपी उपराष्ट्रपति पद पर ऐसा व्यक्ति देखना चाहती है जो उसकी राह में सहयोग करे और कोई रुकावट न डाले तथा सदन में विपक्ष को दबाकर रखे। यदि उपराष्ट्रपति पद शोभा का माना जाता है तो उसके लिए इतना विवाद क्यों होना चाहिए? वास्तव में राज्यसभा का सभापति होने की वजह से उसका विशेष महत्व है। लोकसभा में किसी मुद्दे पर बहस के बाद विपक्ष के लिए राज्यसभा का ही आधार रहता है। यद्यपि दोनों प्रत्याशी दक्षिण भारत के हैं लेकिन एक का संघ विचारधारा से जुड़ाव है तो दूसरा कानून विशेषज्ञ है। बीजेपी ने अपने प्रत्याशी का चयन तमिल अस्मिता से जोड़ दिया है तथा महाराष्ट्र के नेताओं से भी अपील की है कि वह अपने राज्यपाल को उपराष्ट्रपति बनाने में सहयोग दें। इस चुनाव को राष्ट्रवाद बनाम बहुमुखी उदारवाद का रूप दिया जा रहा है। इस मामले में अपनी राय जाहिर करते हुये पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस बयान पर हस्ताक्षर करनेवाले जजों का ट्रैक रिकार्ड हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करने का रहा है। ये लोग विपक्षी दलों के थिंक टैंक का काम करते हैं। उनका बयान न्यायिक चिंता का चिन्ह नहीं है बल्कि पूर्वाग्रह युक्त है। जो व्यक्ति आलोचना के प्रति संवेदनशील है, उसे चुनाव ही नहीं लड़ना चाहिए।
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लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Former judges took the side of sudarshan reddy
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