
नक्सलवाद पर गहरी चोट है हिडमा का सफाया (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सली आतंक से पूरी तरह मुक्त करने की घोषणा की थी। उसी के अनुरूप सुरक्षा बल नियोजित व समन्वित तरीके से दुर्दांत नक्सलियों का घेर कर सफाया कर रहे हैं या इतना दबाव बना रहे हैं कि वह सरेंडर करने के लिए बाध्य हो जाएं। खूंखार नक्सली कमांडर माडवी हिडमा व उसकी दोनों पत्नियों को आंध्रप्रदेश के मारेदुमिली इलाके में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने मार गिराया। इससे नक्सलवाद की रीढ़ टूट गई है। हिडमा 5 बड़ी मुठभेड़ों में शामिल था और 2 दशकों से 5 राज्यों में आतंक मचा रहा था। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश व ओडिशा में उसकी दहशत थी।
मई 2013 में झीरम घाटी में घात लगाकर किए गए हमले के पीछे भी हिडमा की साजिश थी। इस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के अलावा नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा जैसे छत्तीसगढ़ के बड़े कांग्रेस नेताओं की गोलियों की बौछार कर हत्या की गई थी। हिडमा जंगलों का चप्पा-चप्पा जानता था और उसे पकड़ना असंभव माना जाता था। लोग उसके नाम से कांप जाते थे। गत माह नक्सली कमांडर मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति ने गडचिरोली में आत्मसमर्पण किया था। इसके लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी प्रयास किए थे। इनके बाद उसकी अपील पर बीजापुर में 140 से ज्यादा नक्सलियों ने हथियार सहित सरेंडर किया था। हिडमा को उसकी मां ने सरेंडर करने का संदेश भेजा था लेकिन उसे यह भी डर था कि ऐसा करने पर अन्य नक्सली नेता उसे गद्दार करार देकर मार डालेंगे।
हथियार छोड़ने का मन बना चुके रूपेश और चंदना की भी हत्या की गई थी। बहुत से नक्सली इसी डर की वजह से सरेंडर नहीं कर रहे हैं। इतना निश्चित है कि यदि उन्होंने शीघ्र आत्मसमर्पण नहीं किया तो सुरक्षा बल उन्हें छोड़ेंगे नहीं। संविधान और कानून को नहीं माननेवाले नक्सलियों के आतंक की वजह से पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं हो पा रहा है। उनके नेता उद्योगपतियों से प्रोटेक्शन मनी के नाम पर मोटी रकम वसूल करते हैं।
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सरकार नक्सलवाद का खात्मा तो कर देगी लेकिन आदिवासी क्षेत्रों का विकास कर वहां लोगों को रोजगार और न्याय भी देना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य पर ध्यान देते हुए स्कूल, अस्पताल, सड़क व परिवहन की व्यवस्था करनी होगी। आदिवासियों की समस्या हल करने को प्राथमिकता देना जरूरी है। नक्सलवाद पनपने का कारण अशिक्षा, गरीबी, शोषण व भ्रष्टाचार भी था। इसका फायदा माओवादियों ने उठाया और अराजकता फैलाई। आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में लाने का पूरा प्रयास करना होगा ताकि नक्सलवाद का पूरी तरह उन्मूलन हो जाए।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






