नवभारत संपादकीय: ट्रंप के चक्रव्यूह में फंसे मुस्लिम देश! पाकिस्तान पर अब्राहम करार मानने का दबाव
Abraham Accords: अब्राहम करार को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तान समेत कई मित्र देशों पर इजराइल को मान्यता देने का दबाव बनाया है। क्या शहबाज सरकार कट्टरपंथियों के डर से घुटने टेकेगी या चीन का दामन थामेगी?
- Written By: आकाश मसने
डोनाल्ड ट्रंप व पाकिस्तानी आर्मी चीफ आसिम मुनीर (डिजाइन फोटो)
Donald Trump Pressure On Pakistan: अमेरिका के मित्र देशों को समझ में आ रहा है कि वह अपने स्वार्थ के लिए उन्हें भी दबाता और झुकाता है। ट्रंप ने मित्र देशों पर दबाव डाला है कि वह अब्राहम करार स्वीकार कर इजराइल को मान्यता दें। पाकिस्तान हमेशा इजराइल के खिलाफ रहा है। फिलिस्तीन का समर्थन करने वाले पाकिस्तान को इस मुद्दे पर अमेरिका का दबाव सहन नहीं हो रहा है।
2016 में जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तब उन्होंने इजराइल की विस्तारवादी नीति का समर्थन किया था। ट्रंप ने अब्राहम करार की संकल्पना पेश की थी। उनका कहना था कि यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्म का उदय अब्राहम से हुआ। ईरान के हमले का भय दिखाकर ट्रंप ने अरब देशों को अब्राहम करार में शामिल होने को कहा और इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम एशिया की शांति व समृद्धि के लिए यह आवश्यक करार है।
किन देशाें ने माना अब्राहम करार?
इजराइल से पहले लड़ चुके जॉर्डन और मिस्र जैसे देशों ने यह शांति समझौता कर लिया। बहरीन व यूएई की कभी भी इजराइल से लड़ाई नहीं हुई थी, लेकिन उन्होंने भी करार के माध्यम से इजराइल को मान्यता दे दी। केवल सऊदी अरब व कतर जैसे धनाढ्य देशों ने इस बारे में जल्दबाजी नहीं की, लेकिन विगत वर्षों में गाजा पट्टी में इजराइल द्वारा किए गए नरसंहार को देखते हुए वह भी दबाव में आते दिखाई दे रहे हैं।
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पाकिस्तान पर अब्राहम करार में शामिल होने का दबाव
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम के लिए मध्यस्थता की। इसके लिए डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की तारीफ की, लेकिन अब पाकिस्तान पर अब्राहम करार में शामिल होकर इजराइल से मित्रता करने का दबाव डाला जा रहा है। यदि मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अमेरिका के दबाव में आ गए तो पाकिस्तान की जनता व कट्टरपंथी संगठन इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। क्योंकि वह यहूदियों का विरोध और फिलिस्तीन का समर्थन करते आ रहे थे।
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पाकिस्तान भी दोहरी चाल चल रहा है। शहबाज शरीफ के बीजिंग पहुंचने पर चीन ने खुद को पाक का पक्का दोस्त (ऑल वेदर फ्रेंड) बताया है। खाड़ी देशों को भी लग रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप से दुश्मनी और दोस्ती दोनों ही महंगी पड़ती है। अमेरिका में अधिकांश बड़ा व्यवसाय व नामी कंपनियां यहूदी व्यापारियों की हैं। ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर भी ईसाई नहीं, बल्कि यहूदी हैं। ट्रंप ने ईरान से समझौता वार्ता के लिए और उसके पहले भी कुशनर को खाड़ी देशों में भेजा था।
धनाढ्य देशों के हितों की रक्षा का प्रयास कर रहे ट्रंप
इजराइल समर्थक रिपब्लिकन धनाढ्यों के हितों की रक्षा के लिए ट्रंप लगातार प्रयासरत हैं। वह पहले ही फिलिस्तीनियों को तबाह कर गाजा को सैरगाह या रिवेरा बनाने का इरादा जाहिर कर चुके थे। ईरान से समझौता करने के लिए अमेरिका अपनी शर्तें लाद रहा है, जिनमें समृद्ध यूरेनियम को नष्ट करना और होर्मुज की नाकेबंदी हटाना है। ईरान भी पूरी तरह घुटने टेकने को तैयार नहीं है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
