नवभारत विशेष: ईरान-अमेरिका तनाव, पेट्रोल-डीजल पर अपना मुनाफा कम करे सरकार

Iran US Tension Fuel Price Hike: कच्चे तेल की कीमत 116 डॉलर तक पहुंचने से पेट्रोल-डीजल पर दबाव बढ़ा। तेल कंपनियों का दावा है कि उन्हें भारी नुकसान हो रहा है और दाम बढ़ सकते हैं।
Navbharat Special: Iran-US Tensions—Government Should Reduce Its Margins on Petrol and Diesel
तेल कीमत वृद्धि,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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India Petrol Diesel Loss: तेल कंपनियों की तरफ से तेल महंगा किए जाने की भूमिका बांधी जाना शुरू हो गया है। कंपनियों कह रही हैं कि उन्हें हर दिन 2400 करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है। यही समझा जा सकता है कि सरकार के इशारे पर ही उन्होंने भूमिका बांधनी शुरू कर दी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिस तरह से दोबारा ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए किसी भी समय फिर से जंग शुरू होने के आसार बन गए हैं।

पिछले एक पखवाड़े के भीतर क्रूड ऑयल की कीमत प्रति बैरल 96 अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 30 अप्रैल को 116 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। इससे हिसाब लगाकर भारतीय तेल कंपनियां कह रही हैं कि उन्हें प्रति लीटर पेट्रोल में 14 रुपए और डीजल में 18 रुपए का नुकसान झेलना पड़ रहा है।

जबकि हकीकत यह है कि वित्त वर्ष 2025-26 में जब ज्यादातर समय क्रूड ऑयल औसतन 71 डॉलर प्रति बैरल रहा, तब इन कंपनियों ने 9 महीने में करीच 1.37 लाख करोड़ रुपए यानी हर रोज करीब 116 करोड़ रुपए का लाभ कमाया था। ऐसे में सवाल है कि जब तेल कंपनियां लाभ कमा रही थीं और उनसे कई गुना ज्यादा सरकारें कमा रही थीं, तब किसी को यह ख्याल क्यों नहीं आया कि आखिर जब क्रूड ऑयल सस्ता मिल रहा है, तो क्यों न उसका लाभ आम आदमियों को भी मिले? अब, जब क्रूड ऑयल महंगा हो गया है, तो तेल कंपनियों के कंधे पर बंदूक रखकर केंद्र और राज्य सरकारें कीमतें बढ़ाने की भूमिका बांध रही हैं।

अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपने मुनाफे को दो तिहाई छोड़ दें तो लोगों को पेट्रोल जंग शुरू होने से पहले की कीमत से भी सस्ता मिल सकता है। जरा 100 रुपए के पेट्रोल का पूरा ब्रेक डाउन देखें। आज की तारीख में 100 रुपए का जो पेट्रोल हम खरीदते हैं, कच्चे तेल के रूप में वह 35 से 40 रुपए के बीच आता है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में टैक्स हिस्सेदारी पर सवाल

अब इसे रिफाइन करने और ट्रांसपोर्ट करके विक्री की जगह ले जाने में 8 से 10 रुपए खर्च होते हैं यानी 43 से 50 रुपए बन गए। अब इस बिकने वाले डीजल और पेट्रोल में तेल कंपनियों का मार्जिन 3 से 5 रुपए प्रति लीटर बनता है यानी एक लीटर पेट्रोल 46 से 55 रुपए तक की कीमत का हुआ, जो हमें 100 रुपए में मिलता है। सवाल है फिर 45 से 54 रुपए कौन ले जाता है? तो इसमें 18 से 20 रुपए सीधे केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी के रूप में लेता है और राज्य सरकारें 20 से 25 रुपए प्रति 100 रुपए के पेट्रोल-डीजल में अपने मुनाफे के रूप ले लेती हैं। यह भी जान लीजिए हर राज्य का वैट अलग-अलग है। कुछ राज्यों में तो यह 30 फीसदी से भी ज्यादा है।

कहने का मतलब यह कि 100 रुपए का अभी जो हम पेट्रोल खरीदते हैं। उसमें 46 से लेकर 54 रुपए तक सरकारों का टैक्स या उनकी उगाही होती है, यह हमेशा से ऐसा ही रहा है। ऐसे में अगर फिलहाल तेल का जो वैश्विक संकट खड़ा हो गया है, उसमें केंद्र और राज्य सरकारें यदि अपने मुनाफे को आधा भी कर दें, तो आम लोगों को न केवल इस जंग की हालात बनने के पहले की कीमत पर डीजल-पेट्रोल मिलता रहेगा बल्कि तब भी केंद्र और राज्य सरकारों को अच्छा खासा मुनाफा भी होता रहेगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपने मुनाफे में किसी तरह की कटौती नहीं करना चाहतीं।

ये सब इस आपदा को अवसर के रूप में भुनाने की कोशिश में हैं और इसके लिए वो खुद कुछ नहीं कह रहीं बल्कि तेल कंपनियों के जरिए महंगे तेल की भूमिका बनवा रही हैं। तेल कंपनियों ने 4 मई के बाद 10 रुपए प्रति लीटर भी डीजल और पेट्रोल में इजाफा कर दिया, तो आम लोगों का जीना दूभर हो जाएगा।

तेल-गैस महंगे होने से महंगाई और पलायन में बढ़ोतरी

तेल और डीजल भले 10 रुपए ही महंगा हो, बाकी हर चीज इससे ड्योढ़ी या दुगनी महंगी होगी। जब से ईरान जंग शुरू हुई है, तब से रसोई गैस या दूसरी चीजों के महंगे होने के कारण मासिक बजट में 3 से 4 हजार रुपए की बढ़ोत्तरी हो गई है और अब अगर यह कहर टूटा तो आम लोगों की तो छोड़िए मध्यवर्ग भी सीधी कमर के साथ खड़ा नहीं रह पाएगा, क्योंकि डॉलर के विरुद्ध रुपया पहले ही 95 तक पहुंच गया है।

इस कारण महंगाई हर क्षेत्र में 8 से 10 फीसदी तक बढ़ गई है। आप्रत्यक्ष रूप से बड़ी महंगाई और गैस की किल्लत के कारण पिछले तीन महीनों में 15 से 20 फीसदी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का शहरों से अपने गांवों की ओर पलायन हो चुका है।

लेख- वीना गौतम के द्वारा

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