प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Bangladesh Election Fairness: शेख हसीना, जो इस समय भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं, की अवामी लीग पार्टी पर प्रतिबंध लगा हुआ है, इसलिए वह चुनाव में भाग न ले सकी। शेखा हसीना ने चुनाव को ‘सुनियोजित स्वांग’ बताया है।
चहरहाल, 300 संसदीय सीटों (जिनमें से एक पर चुनाव स्थगित हुआ, प्रत्याशी के निधन के कारण) के लिए 50 राजनीतिक दलों के सदस्यों व स्वतंत्र प्रत्याशियों सहित लगभग 2000 उम्मीदवार मैदान में थे और तकरीबन 48 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2024 के आम चुनाव के 42 प्रतिशत मतदान से बेहतर रहा।
बांग्लादेश के एक सदन वाले राष्ट्रीय संसद को जातीय संसद कहते हैं। इसमें 300 सदस्य सीधे जनता द्वारा चुनकर आते हैं, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जो चुनाव के बाद पार्टियों में उनकी जीत के अनुपात में विभाजित कर दी जाती हैं।
बांग्लादेश में 1973 से 2026 तक जो कुल 13 आम चुनाव हुए हैं, उनमें से सिर्फ पांच (1991, 1996-2, 2001, 2008 व 2026) को ही अंतर्राष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव घोषित किये हैं।
1996 में दो बार आम चुनाव कराने पड़े थे, क्योंकि 1996-1 चुनाव को अधिकतर विपक्षी पार्टियों ने बायकाट किया था और बीएनपी ने खुद को 278 सीटों पर जीता हुआ दिखाया था।
दरअसल, बांग्लादेश में अधिकतर चुनावों की कहानी राजनीतिक पार्टियों द्वारा बायकाट व उन पर प्रतिबंध के इर्दगिर्द ही घूमती रही है। शेख हसीना ने 2009 के बाद से 15 साल तक निरंतर राज किया और उनके शासनकाल में बांग्लादेश में स्थिरता व आर्थिक विकास देखने को मिला। लेकिन साथ ही उन पर तानाशाह होने के भी आरोप लगे, जिसकी वजह से उनके खिलाफ विद्रोह हुआ और 2024 में उन्हें अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी।
अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी गठबंधन का सत्ता में आना तय हो गया है, लेकिन बांग्लादेश के समक्ष चुनौतियों का अम्बार लगा हुआ है। सबसे पहले तो पिछले 18 माह में धीमे हुए आर्थिक विकास को पटरी पर लाने की आवश्यकता है ताकि बेरोजगारी, महंगाई आदि समस्याओं का समाधान निकाला जा सके। इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर जो हिंसक हमले हो रहे हैं, उन पर त्वरित प्रभाव से विराम लगाया जाये।
बीएनपी से सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रोत्साहित करने की उम्मीद की जा सकती है, विशेषकर इसलिए कि उसके प्रमुख हिन्दू लीडर ज्ञानेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका-3 सीट से शानदार जीत दर्ज की है, जमात-ए-इस्लामी के मुहम्मद शाहीनूर इस्लाम को पराजित करके, रॉय की जीत बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है कि डाका-3, जो मुस्लिम बहुल सीट है, पर पहली बार कोई हिन्दू प्रत्याशी जीता है।
रॉय बीएनपी की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं। तारिक रहमान के समक्ष भारत से संबंध सुधारने की भी चुनौती है, जो शेख हसीना को शरण देने की वजह से प्रभावित हुए हैं। गौरतलब है कि तारिक रहमान जब आत्म-निर्वासन से बांग्लादेश लौटे थे, तो नई दिल्ली ने अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर को उनसे मुलाकात करने के लिए ढाका भेजा था।
इसलिए भारत व बांग्लादेश के संबंध बेहतर होने की संभावना है। बांग्लादेश में मतदान के साथ ही जुलाई नेशनल चार्टर, जो 84-पॉइंट का सुधार पैकेज है, पर भी जनमतसंग्रह हुआ था। इस चार्टर को जनता ने अपनी सहमति दी है, लेकिन जनमतसंग्रह कहीं भी अच्छा विचार साबित नहीं हुआ है। ब्रिटेन के सांसद 1998 में इस विषय पर कुछ भी तय
नहीं कर पाये थे।
जनरल जिया-उर-रहमान व खालिदा जिया के 60 वर्षीय बेटे तारिक रहमान 17-साल तक निर्वासन में रहने के बाद स्वदेश लौटे, चुनाव लड़ा और अब वह बांग्लादेश के नये प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।
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उनके बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) गठबंधन ने 12 फरवरी 2026 को जातीय संसद के लिए हुए 13वें आम चुनाव में 212 सीटें जीती हैं। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन को कुल 77 सीटें हासिल हुई हैं, जिसमें 5 सीटें नेशनल सिटीजन पार्टी की है, जिसने जेन जी आंदोलन में शेख हसीना का तख्ता पलटने में अहम भूमिका अदा की थी।
–लेख विजय कपूर के द्वारा