भारत बॉर्डर के पास जमात-ए-इस्लामी की बड़ी जीत, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
India On High Alert After Bangladesh Election: बांग्लादेश के हालिया आम चुनाव के नतीजों ने न केवल वहां की आंतरिक राजनीति में हलचल मचाई है बल्कि भारत के सुरक्षा गलियारों में भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। जहां एक ओर तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (BNP) सरकार बनाने का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने 70 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि जमात की यह जीत उन जिलों में हुई है जो सीधे तौर पर भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के विश्लेषण के अनुसार, सतखीरा, कुश्तिया, खुलना बेल्ट और रंगपुर जैसे इलाके अब जमात-ए-इस्लामी के नए मजबूत गढ़ बनकर उभरे हैं। ये क्षेत्र रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं क्योंकि ये पश्चिम बंगाल-असम और विशेष रूप से भारत के ‘सिलिगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन्स नेक) के बिल्कुल सामने पड़ते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इन ग्रामीण इलाकों में जमात ने मस्जिदों और मदरसों के अपने पुराने धार्मिक नेटवर्क के जरिए सामाजिक और राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया है।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां अब हाई अलर्ट पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा के इतने करीब किसी भी कट्टरपंथी विचारधारा वाले दल की मजबूती को हल्के में नहीं लिया जा सकता। खुफिया आकलन के अनुसार, ऐसी विचारधाराएं भविष्य में सीमावर्ती क्षेत्रों में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने, नए सदस्यों की भर्ती करने और एक मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार करने का काम कर सकती हैं। हालांकि वर्तमान में किसी सीधे सुरक्षा खतरे की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन लंबे समय के लिए इसे एक चुनौती माना जा रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स का संकेत है कि सीमावर्ती जिलों में इस राजनीतिक बदलाव का सीधा असर वहां रहने वाली अल्पसंख्यक आबादी पर पड़ सकता है। भविष्य में इन क्षेत्रों में जमीन विवाद, स्थानीय दबाव और सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। दिल्ली के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-बांग्लादेश संबंधों में सीमा सुरक्षा और स्थिरता हमेशा प्राथमिकता रही है।
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जीत के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी ने चुनावी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी ने आधिकारिक बयान जारी कर परिणामों की पारदर्शिता पर आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम था और चुनाव आयोग ने पूर्ण वोट प्रतिशत जारी करने में पारदर्शिता नहीं दिखाई जिससे विसंगतियां पैदा हुई हैं।