बांग्लादेश में अब जुलाई चार्टर, सांकेतिक फोटो (सो.सोशल मीडिया)
Bangladesh Constitution Amendment: बांग्लादेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी मोड़ आ गया है। 12 फरवरी को हुए आम चुनाव के साथ-साथ देश में एक महत्वपूर्ण जनमत संग्रह भी आयोजित किया गया था जिसके नतीजों ने देश के पूरे संवैधानिक ढांचे को बदलने का रास्ता साफ कर दिया है। जनता ने भारी बहुमत से ‘YES Vote’ को चुनकर ‘जुलाई चार्टर’ के तहत प्रस्तावित सुधारों पर अपनी मुहर लगा दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब बांग्लादेश की जनता केवल सरकार ही नहीं बल्कि एक नया संवैधानिक तंत्र चाहती है।
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली व्यवस्था द्वारा पेश किए गए इस सुधार चार्टर का मुख्य उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण करना है। अब तक बांग्लादेश की संसद ‘यूनिकैमरल’ (एक सदन वाली) थी, लेकिन नए सुधारों के बाद यह ‘बायकैमरल’ यानी दो सदनों वाली हो जाएगी। भारत की तर्ज पर वहां भी एक ‘ऊपरी सदन’ या ‘राज्यसभा’ का गठन किया जाएगा जिसमें कुल 100 सदस्य होंगे।
इन सदस्यों का आवंटन राजनीतिक दलों को चुनाव में मिली सीटों के अनुपात में किया जाएगा। अब किसी भी बड़े संविधान संशोधन के लिए निचले सदन में दो-तिहाई और ऊपरी सदन में बहुमत की आवश्यकता होगी जिससे कोई भी पार्टी अकेले मनमाना फैसला नहीं ले पाएगी।
‘जुलाई चार्टर‘ के सबसे चौंकाने वाले सुधारों में प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा तय करना शामिल है। नए नियमों के अनुसार, अब कोई भी व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में अधिकतम 10 साल (दो कार्यकाल) तक ही प्रधानमंत्री रह सकता है। साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया है कि प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति एक ही समय में अपनी राजनीतिक पार्टी का प्रमुख नहीं रह पाएगा।
इसके विपरीत, राष्ट्रपति की शक्तियों में इजाफा किया गया है अब वे मानवाधिकार आयोग, प्रेस काउंसिल और बांग्लादेश बैंक के गवर्नर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर स्वतंत्र रूप से नियुक्तियां कर सकेंगे।
मौजूदा संविधान के आर्टिकल 70, जो सांसदों को पार्टी लाइन के खिलाफ वोट करने से रोकता था उसमें अब ढील दी जाएगी, जिससे सांसद स्वतंत्र रूप से मतदान कर सकेंगे। इसके अलावा, अब प्रधानमंत्री अकेले देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा नहीं कर पाएंगे इसके लिए उन्हें कैबिनेट के साथ-साथ विपक्ष के नेता की सहमति भी लेनी होगी। सुधारों के तहत यह भी तय किया गया है कि निचले सदन का डिप्टी स्पीकर हमेशा विपक्षी पार्टी से ही होगा।
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इन सुधारों को लागू करने के लिए एक ‘संवैधानिक सुधार परिषद’ का गठन किया जाएगा जिसमें निर्वाचित सांसद शामिल होंगे। यह परिषद अपनी पहली बैठक से 180 दिनों के भीतर इन सभी सुधारों को लागू करने की प्रक्रिया पूरी करेगी। यह बदलाव 2024 के छात्र विद्रोह की उन मांगों का परिणाम है, जिसमें युवाओं ने सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ आवाज उठाई थी।