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छठ पूजा में डूबते हुए सूरज को भी क्यों देते हैं अर्घ्य, जानिए इसकी असली वजह
छठ पूजा में तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है, क्योंकि यह समय प्रतीकात्मक रूप से जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों को समाप्त करने और नवजीवन का आरंभ करने का संकेत देता है।
- Written By: सीमा कुमारी

छठ पूजा में डूबते हुए सूरज को भी क्यों देते हैं अर्घ्य,
Chhath Puja 2024: सूर्य देवता और छठी मइया को समर्पित छठ महापर्व हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल में बहुत धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
छठ पूजा के चार दिनों के अनुष्ठान में तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य सूर्य देवता और उनकी पत्नी प्रत्यूषा को सम्मानित करना है। छठ पूजा का आरंभ कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय की परंपरा के साथ हो जाता है।
यह पर्व 4 दिनों तक चलता है। दूसरे दिन खरना की रस्म पूरी की जाती है और तीसरे दिन यानी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा की जाती है। छठ पूजा के चौथे दिन सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छठ पर्व का समापन हो जाता है। आइए जानते हैं डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का कारण।
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जानिए क्या डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का कारण
ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, छठ पूजा में तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है, क्योंकि यह समय प्रतीकात्मक रूप से जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों को समाप्त करने और नवजीवन का आरंभ करने का संकेत देता है।
डूबते सूर्य की पूजा करके व्यक्ति जीवन में आने वाले अंधकार को दूर करने और नई ऊर्जा के साथ अगली सुबह का स्वागत करने की शक्ति प्राप्त करता है।
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देवी प्रत्यूषा का संबंध डूबते हुए सूर्य से है
ज्योतिषयों की मानें तो, डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के दौरान सूर्यदेव की पत्नी प्रत्यूषा की भी पूजा की जाती है। प्रत्यूषा का संबंध सांध्यकाल से है और उन्हें शाम के समय की देवी माना जाता है। प्रत्यूषा का नाम ‘प्रत्यूष’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘संध्या’ या ‘सूर्यास्त का समय’। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रत्यूषा सूर्यदेव की दूसरी पत्नी मानी जाती हैं।
कहा जाता है कि सूर्य देव के डूबते हुए स्वरूप के माध्यम से उनकी पत्नी प्रत्यूषा की भी पूजा होती है, ताकि शाम का समय भी सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करे।
मान्यता है कि जब सूर्य देव अपनी पत्नी संज्ञा से अलग हुए, तो संज्ञा के रूप का विस्तार प्रत्यूषा और छाया के रूप में हुआ। प्रत्यूषा और छाया दोनों ही संज्ञा के विभिन्न रूप माने गए। सूर्य के अस्त होते समय प्रत्यूषा का प्रभाव बढ़ता है इसलिए, डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते समय प्रत्यूषा की भी पूजा होती है। यह पूजा समस्त जीव-जंतुओं को ऊर्जा प्रदान करने के लिए सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
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Why is arghya offered even to the setting sun during chhath puja
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