
ज्ञान की देवी मां सरस्वती (सौ.सोशल मीडिया)
Basant Panchami And Holi Connection: मकर संक्रांति के तुरंत बाद बसंत पंचमी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बसंत पंचमी का पावन पर्व हिंदू धर्म में बुद्धि और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना से जुड़ा है। लोक मान्यता के अनुसार, इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण कर मां सरस्वती की पूजा करते हैं और विद्या, बुद्धि व विवेक की कामना के लिए प्रार्थना भी करते हैं।
लेकिन, क्या आप जानते है कि, बसंत पंचमी का पावन पर्व के साथ-साथ होली के उत्सव की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं, जबकि होली का पर्व हर वर्ष फाल्गुन मास में मनाया जाता है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर बसंत पंचमी और होली के बीच क्या धार्मिक संबंध है।
लोक मान्यता के अनुसार, बसंत पंचमी के साथ ही बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है। यह दिन इस बात का संकेत देता है कि शीत ऋतु अब विदा लेने वाली है और प्रकृति नवजीवन से भरने लगी है।
ऋतुओं का राजा बसंत ऋतु को कहा गया है, क्योंकि इस समय प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है। चारों ओर पेड़ों पर फूल खिलने लगते हैं और सरसों के खेत पीले फूलों से लहलहा उठते हैं। यही कारण है कि बसंत ऋतु को नई ऊर्जा, उल्लास और खुशियों का प्रतीक माना गया है।
बताया जाता है कि, बसंत पंचमी और होली दोनों ही बसंत ऋतु से जुड़े पर्व हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, बसंत ऋतु का आगमन ही होली के उत्सव की शुरुआत का संकेत माना जाता है।
इसी दिन से फाग गीत गाए जाने लगते हैं। विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही होली का पर्व आरंभ हो जाता है, जो लगभग 40 दिनों तक चलता है। इस दौरान प्रतिदिन मंदिरों में भगवान को गुलाल अर्पित किया जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि में रंग और प्रेम का संचार करने के लिए कामदेव और रति ने भगवान शिव की तपस्या भंग की थी। इसी घटना के बाद से बसंत पंचमी से लेकर होली तक के समय को प्रेम, आनंद और उत्साह का काल माना जाने लगा।

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यही कारण है कि जहां बसंत पंचमी पर शांति और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पूजा होती है, वहीं धीरे-धीरे यही वातावरण उल्लास, रंग और आनंद में परिवर्तित हो जाता है। बसंत पंचमी और होली दोनों ही पर्व प्रकृति, प्रेम और उत्साह से जुड़े हुए हैं। बसंत पंचमी से होली तक का समय प्रकृति के रंगों और जीवन के उल्लास का उत्सव माना जाता है।






