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एकादशी व्रत की शुरुआत किस समय करें, विशेष कृपा के लिए पूजा विधि और पूजा सामग्री की लिस्ट नोट कीजिए
Ekadashi Puja: मान्यता है कि एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ फल देने वाला होता है। एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी से की जाती है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था।
- Written By: सीमा कुमारी

एकादशी व्रत की शुरुआत क्यों होती है उत्पन्ना एकादशी से (सौ.सोशल मीडिया)
Ekadashi Puja Vidhi: एकादशी तिथि को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। यह शुभ दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है और मान्यता है कि एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ फल देने वाला होता है। एकादशी व्रत की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी से की जाती है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था।
हिंदू मान्यता के अनुसार, मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी हर वर्ष बेहद खास मानी जाती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस व्रत से मिलने वाला पुण्य अश्वमेध यज्ञ के समान बताया गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने से जीवन में सद्बुद्धि, सकारात्मकता, धन-समृद्धि और मानसिक शांति बढ़ती है।
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इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। जो व्यक्ति पहली बार एकादशी व्रत शुरू करना चाहता है, उसके लिए इस एकादशी को सबसे शुभ और फलदायी माना गया है। ऐसे में आइए जानते हैं एकादशी व्रत की शुरुआत क्यों होती है उत्पन्ना एकादशी से?
एकादशी व्रत की शुरुआत क्यों होती है उत्पन्ना एकादशी से
अगर हिंदू शास्त्रों की बात करें तो, भगवान विष्णु ने दैत्य मुरसुरा के अत्याचारों से देवताओं को बचाने के लिए अपने शरीर से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न की। यही शक्ति एकादशी देवी कहलाती है।
उन्होंने असुर का वध कर धर्म की रक्षा की। इसी कारण इस तिथि को एकादशी का जन्मदिन माना जाता है और यहां से व्रत की शुरुआत सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। जो व्यक्ति पहली बार एकादशी व्रत करना चाहता है, उसे उत्पन्ना एकादशी से ही यह शुरुआत करने की सलाह दी जाती है।
कैसे करें एकादशी व्रत
- सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है।
- इस दिन सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
- घर के मंदिर में घी का दीप प्रज्वलित करें और स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
- भगवान विष्णु को चंदन, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।
- यदि संभव हो तो इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखें।
- प्रात:काल “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और दिनभर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
- शाम को भगवान की आरती करें और भोग लगाएं।
- भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा भी इस दिन अत्यंत शुभ मानी जाती है।
- अगले दिन पारण शुभ समय में करें और तुलसी जल के साथ व्रत खोलें।
एकादशी व्रत की पूजा सामग्री लिस्ट-
गंगाजल, पुष्प, तुलसीदल, चंदन, अक्षत, घी का दीपक, धूप, पंचामृत, मिष्ठान, फल नारियल, सुपारी, मूली, शकरकंद, आंवला, अमरुद, सीताफल, सिंघाड़ा ऋतुफल
ये हैं एकादशी नियम-
- चावल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन न खाएं।
- किसी का मन न दुखाएं।
- झूठ, क्रोध और वाद-विवाद से दूरी रखें।
- दिनभर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
- शाम को दीपदान करना शुभ माना गया है।
- जरूरतमंद को अन्न या कंबल का दान अवश्य करें।
एकादशी व्रत से मिलता है अश्वमेध यज्ञ के सामान पुण्य
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से मन शांत और स्थिर होता है। जीवन में आने वाली समस्त विध्नं बाधाएं दूर होती हैं।
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धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। वैवाहिक और पारिवारिक सुख बढ़ता है। मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा भक्तों पर सदेव बनी रहती है।
Why does ekadashi fasting begin with utpanna ekadashi
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