750 साल पहले एक गाय जहां खुद देने लगती थी दूध, फिर एक रात में बना मंदिर, जानिए

मनकामेश्वर महादेव मंदिर, भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जो अपनी चमत्कारी और रहस्यमयी बातों के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। जहां माता पार्वती ने तपस्या की थी।
750 साल पहले एक गाय जहां खुद देने लगती थी दूध, फिर एक रात में बना मंदिर, जानिए
मनकामेश्वर महादेव मंदिर (सौ.सोशल मीडिया)
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Shri Mankameshwar Mahadev mandir : मध्य प्रदेश में कई ऐसे प्राचीन और एतिहासिक शिवमंदिर मौजूद है जो भक्तों के आस्था और श्रद्धा से जुड़ा हैं। इन मंदिरों का अपना-अपना महत्व और मान्यता है। सावन का पावन महीना चल रहा हैं। इस महीने में लोग भगवान शिव की पूजा पाठ करते है और जीवन में सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

सावन महीने के उपलक्ष्‍य में आज हम आपको मध्य प्रदेश के ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। जो मंदिर मध्य प्रदेश के शाजापुर में स्थित हैं।

यह शाजापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूरी पर कुम्हारिया गांव में स्थित। जो मनकामेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्द हैं। जिससे लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी चमत्कारी एवं रहस्मय बातें -

यहां आए भक्तों हर मुराद होती है पूरी

जानकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार, मनकामेश्वर मंदिर को लेकर भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी यहां सच्चे मन से अपनी मनोकामना लेकर आता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। साल भर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन खासकर सावन के महीने और शिवरात्रि के पर्व पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। सावन में तो यहां मेला सा वातावरण बन जाता है।

एक गाय ने किया था शिवलिंग का उद्भव

बताया जाता है कि, इस प्राचीन मंदिर से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक कथा प्रचलित है। करीब 750 वर्ष पहले, गांव की एक गाय प्रतिदिन एक विशेष स्थान पर जाकर मिट्टी के ढेर पर अपने आप दूध बहाने लगती थी। यह दृश्य देखकर ग्रामीण चकित हो उठे और उन्होंने उस स्थान की खुदाई की। खुदाई में जो निकला, वह एक शिवलिंग था, जिसे आज हम मनकामेश्वर महादेव के नाम से पूजते हैं।

रहस्यमयी शिलालेख, जिसकी भाषा आज भी अनजानी

मंदिर के निर्माण के कुछ वर्षों बाद जब इसका जीर्णोद्धार किया जा रहा था, तब यहां एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ। आज भी यह शिलालेख मंदिर परिसर में सुरक्षित रूप से स्थापित है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अब तक किसी को यह पता नहीं चल पाया कि यह किस भाषा में लिखा गया है, जिससे यह मंदिर और भी रहस्यपूर्ण बन जाता है।

पार्वती माता की तपोस्थली है ये

भक्तों की मान्यता के अनुसार, यह स्थान देवी पार्वती की तपोस्थली भी रहा है। कहा जाता है कि देवी ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए यहीं कठोर तपस्या की थी और अंततः भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन दिए थे। इस धार्मिक कथा से यह मंदिर शिव-पार्वती प्रेम की पवित्र स्मृति भी बन गया है।

मंदिर के कुंड में 12 मास बहता है झरना

अगर बात इस मंदिर की अन्य रहस्यों की करें तो इस मंदिर में एक गौरीकुंड है जिसमें एक झरना है। इस झरने में 12 महीने पानी आता है। इस कुंड में लोग स्नान करते हैं और मानते हैं कि वहां मांगी हुई हर मनोकामना माता गौरी और भगवान शिव पूरी करते है।

मंदिर में चढ़ा हुआ है अनोखा मुकुट

यहां के लोग बताते हैं कि मंदिर में चढ़ा हुआ मुकुट ग्वालियर स्टेट के द्वारा चढ़ाया गया था। सालों पहले ग्वालियर स्टेट ने तीन मुकुट अर्पित किए थे जो एक उज्जैन के महाकालेश्वर में स्थापित है, एक ओंकारेश्वर में और एक यहां मनकामेश्वर में स्थापित है। इस मंदिर से जुड़ी लोगों की बहुत मान्यताएं और कथाएं हैं। यही कारण है की बरसों पुराना यह मंदिर आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

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