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हज़ारों साल पहले जब पांडवों ने की थी छठ पूजा, जानिए क्या मिला परिणाम दूसरी कथा भी जानें
सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्यौहार मुख्यतः सूर्य देव को समर्पित है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से आपकी संतान सुखी रहती है और उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती है। वहीं छठी मैय्या निसंतान लोगों की खाली झोली भर देती हैं। छठ पूजा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है।
- Written By: सीमा कुमारी

जानिए छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा
Chhath Puja 2024: सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्यौहार मुख्यतः सूर्य देव को समर्पित है। इस बार छठ पूजा का प्रारंभ 5 नवंबर 2024 से हो रही है। जिसका समापन 8 नवंबर को होगा।
छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आसपास के क्षेत्रों में
बहुत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। छठ पूजा एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 4 दिनों तक चलती है और इस दौरान महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र व अच्छे स्वास्थ्य के लिए 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखती हैं।
मान्यता है कि इस व्रत को करने से आपकी संतान सुखी रहती है और उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती है। वहीं छठी मैय्या निसंतान लोगों की भी खाली झोली भर देती हैं।
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छठ पूजा की महिमा अनंत है। छठ पूजा के महत्व को समझने के लिए आपको निसंतान राजा प्रियंवद की कथा जरूर पढ़नी चाहिए। कैसे उन्होंने अपने पुत्र की रक्षा के लिए यह छठ पूजा का व्रत किया। आइए जानें छठ पूजा के महत्व और इनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं…
जानिए छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय राजा प्रियंवद थे। विवाह के काफी समय तक उनको कोई संतान नहीं हुई। उनको इस बात की पीड़ा सताती थी। एक बार उन्होंने महर्षि कश्यप से अपने मन की व्यथा कही।
महर्षि कश्यप ने राजा को संतान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराने का सुझाव दिया। राजा प्रियंवद अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ विधि विधान से कराया। यज्ञ में आहुति के लिए खीर बनाई गई।
उस खीर को राजा की पत्नी मालिनी को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने को कहा गया। रानी ने सहर्ष उस खीर को खा लिया। उसके प्रभाव से रानी गर्भवती हो गईं और कुछ समय पश्चात एक बालक को जन्म दिया।
पुत्र प्राप्ति के समाचार से राजा प्रियंवद बहुत खुश हुए, लेकिन यह खुशी कुछ समय के लिए ही थी। वह पुत्र मृत पैदा हुआ था। वह उसके शव को लेकर श्मशान घाट पर पहुंचे। अपने बेटे के वियोग में इतने दुखी थे कि वे भी अपने प्राण त्यागने लगे। तभी वहां पर ब्रह्म देव की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं।
उन्होंने राजा प्रियंवद से ऐसा न करने को कहा। उन्होंने कहा कि उनकी उत्पत्ति सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से हुई है। इस आधार पर उनकी नाम षष्ठी है। तुम षष्ठी की पूजा करो तथा इसके बारे में लोक प्रचार करो। माता षष्ठी की आज्ञा के अनुसार, राजा श्मशान से चले गए। फिर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को उन्होंने नियम पूर्वक षष्ठी माता का व्रत किया तथा उसका प्रचार भी किया। षष्ठी पूजा के प्रभाव से राजा प्रियवद को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
छठ पर्व से पांडवों को वापस मिला राजपाट
छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इसके अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं और पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई है।
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