Jagannath Temples: पुरी ही नहीं, इन 2 जगन्नाथ मंदिरों में महिलाएं निभाती हैं ‘छेरा पहरा’ की परंपरा
Jagannath Rath Yatra: पुरी की रथ यात्रा से दूर दो जगन्नाथ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां पुराने शाही परिवार की महिलाएं 'छेरा पहरा' की रस्म निभाती हैं। इन महिलाओं की भक्ति लिंग-भेद से ऊपर है।
- Written By: रीता राय सागर
जगन्नाथ मंदिर (फोटो. एआई)
Facts About Puri Jagannath Temple: ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा ते बारे में हम सभी जानते हैं। प्रभु जगन्नाथ के लिए उनके भक्तों का अपार प्रेम और भक्ति रस में डूबे श्रद्धालु कई महीनों से रथ यात्रा का इंतजार करते हैं।
लाखों लोग इस पवित्र रथ यात्रा में शामिल होने और प्रभु की एक झलक पाने के लिए दूर-दराज से पुरी पहुंचते हैं। लेकिन पुरी के इस शोरगुल से दूर ऐसी जगहें भी हैं, जहां महिलाएं प्रभु प्रेम में वर्षो से छेरा पहरा की परंपरा को निभा रही हैं।
हर साल, जब पुरी में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के भव्य रथ को आगे बढ़ाया जाता है, तब शाही लिबास पहने, पुरी के गजपति महाराजा सोने की झाड़ू लेकर रथ पर चढ़ते हैं, चबूतरे की सफाई करते हैं और चंदन की खुशबू वाला पानी छिड़कते हैं। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि भगवान के सामने सभी बराबर हैं।
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बहुत से भक्तों के लिए, छेरा पहरा की इस रस्म की यही तस्वीर है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ओडिशा के कुछ हिस्सों में, यह पवित्र रस्म दशकों से राजाओं ने नहीं, बल्कि रानियों ने निभाई है। गंजाम जिले के धरकोट और जाजपुर जिले के गढ़मधुपुर के मंदिर में रानियां इस परंपरा को निभाती आई हैं।
धरकोट: एक राजकुमारी जिसे विरासत में मिली यह जिम्मेदारी
2010 में राजा जयानंद जगदेव के निधन के बाद यह परंपरा बदल गई। कोई पुरुष उत्तराधिकारी न होने के कारण, उनकी बेटी राजकुमारी सुलक्षणा (गीतांजलि) देवी को शाही परिवार की जिम्मेदारियां विरासत में मिलीं।
जगन्नाथ मंदिर (फोटो. एआई)
तब से, राजकुमारी सदियों पुरानी इस परंपरा को बिना किसी रुकावट के निभा रही हैं। पारंपरिक शाही लिबास में, वह सोने की झाड़ू से रथ की सफाई करती हैं। उनके इस काम ने उस पुरानी सोच को चुनौती दी कि यह रस्म सिर्फ पुरुषों का अधिकार है।
गदामधुपुर: परंपरा को आगे बढ़ाती एक रानी
जाजपुर जिले के गदामधुपुर में जगन्नाथ मंदिर में, रानी अपर्णा धीर सिंह भारद्वाज रथ यात्रा की एक और अनोखी परंपरा का चेहरा बन गई हैं। उन्होंने 2008 में अपने पिता के बाद शाही परिवार की मुखिया बनने पर छेरा पहरा की रस्म निभानी शुरू की।
पहले भी कई मौकों पर रानी ने कहा है कि धार्मिक जिम्मेदारियों को निभाने के मामले में उनके परिवार की परंपरा में बेटे और बेटी के बीच कभी कोई फर्क नहीं किया गया। उनके अनुसार, विरासत के साथ अधिकार और कर्तव्य दोनों आते हैं, और ‘छेरा पहरा’ ऐसी ही एक पवित्र जिम्मेदारी है।
अलग परंपरा, भावना वही
पुरी में, ‘छेरा पहरा’ का संबंध सीधे गजपति महाराजा के पद से है, जो यह रस्म एक शासक के तौर पर नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ के सेवक के तौर पर निभाते हैं। इन परंपराओं में एक बात समान है- शाही अधिकार नहीं, बल्कि देवता के सामने विनम्र सेवा।
