एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते है, जानिए क्या है असली वजह

Ekadashi Mein Chawal Kyon Nahi Khate: एकादशी पर चावल खाना वर्जित माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इससे व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता, इसलिए इस दिन चावल का त्याग किया जाता है।
Ekadashi Vrat Mein Chawal Kyon Nahin Khana Chahie
भगवान विष्णु (सौ.सोशल मीडिया)
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Ekadashi Vrat Mein Chawal Kyon Nahin Khana Chahie:जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी तिथि हिन्दू धर्म के सभी व्रतों में सबसे पुण्यदायी माना गया है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रद्धालु व्रत रखकर श्रीहरि की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि विधिपूर्वक एकादशी व्रत करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हालांकि, एकादशी व्रत के कई कठोर नियम होते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण नियम है एकादशी के दिन चावल का सेवन न करना। आइए जानते हैं कि आखिर इस दिन चावल खाना क्यों वर्जित माना गया है?

एकादशी व्रत का आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का सबसे प्रभावशाली उपाय माना गया है। यह व्रत आत्मशुद्धि, मन की एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाता है। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है, जो विशेष फलदायी मानी जाती है।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाया जाता?

पौराणिक कथा के अनुसार, एकादशी पर चावल न खाने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल में पाप का वास होता है, इसलिए इसे खाने से व्रत का फल कम हो जाता है। वैज्ञानिक रूप से, चावल में जल तत्व अधिक होता है, जो मन को चंचल और शरीर में आलस्य बढ़ाता है, जिससे उपवास की साधना में बाधा आती है।

एकादशी पर चावल न खाने के मुख्य कारण

पौराणिक कथा के अनुसार, जब महर्षि मेधा ने माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए शरीर त्यागा, तो उनका शरीर पृथ्वी में मिल गया और उससे जौ व चावल की उत्पत्ति हुई। जिस दिन शरीर का त्याग किया गया, वह एकादशी थी। इसलिए, इस दिन चावल का सेवन करना महर्षि मेधा के मांस व रक्त के सेवन के समान (पाप) माना गया है।

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने पाप-पुरुष को एकादशी के दिन चावल यानी अन्न में निवास करने का स्थान दिया था। एकादशी व्रत का उद्देश्य इंद्रियों को वश में करना है। चावल तमोगुणी अन्न माना जाता है, जो आलस्य और नींद को बढ़ाता है, जो तपस्या के विरुद्ध है।

वैज्ञानिक कारण चावल में अधिक जल तत्व होता है। एकादशी को शरीर से जल की अधिकता को कम करना और मन को शांत रखना होता है, लेकिन चावल का अधिक सेवन इस प्रक्रिया में बाधा डालता है और सुस्ती लाता है।

कहा जाता है कि केवल जगन्नाथ मंदिर, पुरी में एकादशी के दिन चावल का महाप्रसाद मान्य है, क्योंकि वहां भगवान ने पाप को एक कोने में बांध दिया है।

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