
Bhishma Pitamah (Source. Pinterest)
Bhishma Pitamah After Death: महाभारत काल के सबसे महान, त्यागी और धर्मनिष्ठ योद्धाओं में भीष्म पितामह का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। उनका जन्म नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और माता गंगा के पुत्र थे। बचपन से ही देवव्रत में असाधारण गुण, वीरता और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा दिखाई देती थी।
राजा शांतनु के विवाह के लिए देवव्रत ने ऐसा त्याग किया, जिसे आज भी इतिहास में मिसाल के रूप में देखा जाता है। उन्होंने आजीवन विवाह न करने और हस्तिनापुर की गद्दी का त्याग करने की प्रतिज्ञा ली। इसी भयानक और कठोर संकल्प के कारण उनका नाम ‘भीष्म’ पड़ा, जिसका अर्थ है भयानक प्रतिज्ञा लेने वाला।
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से सेनापति बने। वे युद्ध में इतने शक्तिशाली थे कि पांडव भी उन्हें पराजित नहीं कर पा रहे थे। अंततः रणनीति के तहत अर्जुन ने शिखंडी की आड़ लेकर भीष्म पर बाणों की वर्षा कर दी। इन बाणों से उनका पूरा शरीर छलनी हो गया, लेकिन वरदान के कारण उनकी तत्काल मृत्यु नहीं हुई।
भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर 58 दिनों तक पड़े रहे। इस दौरान उन्होंने असहनीय पीड़ा सही, लेकिन धैर्य और संयम नहीं छोड़ा। इसी समय उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्ष, नीति और जीवन के गूढ़ उपदेश दिए, जो आज भी धर्मशास्त्रों का आधार माने जाते हैं।
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भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने तब तक देह नहीं छोड़ी, जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया। मान्यता है कि जो व्यक्ति सूर्य उत्तरायण के समय देह त्यागता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य के उत्तरायण होते ही भीष्म पितामह ने शांत भाव से देह का त्याग किया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। उनका जीवन त्याग, कर्तव्य और धर्म का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज भी उन्हें धर्म, नीति और सत्य का आदर्श माना जाता है।






