
Hastinapur (Source. Pinterest)
Rule after Mahabharat: महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था, लेकिन उसकी पीड़ा और विनाश की छाया अभी भी हस्तिनापुर पर मंडरा रही थी। इतने भयंकर युद्ध के बाद युधिष्ठिर के लिए राजा बनना कोई आसान फैसला नहीं था। चारों ओर बिखरे शव, उजड़ा हुआ राज्य और अपनों की मृत्यु ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। वे बार-बार सोचते थे कि इतने रक्तपात के बाद क्या उन्हें सिंहासन स्वीकार करना चाहिए।
युधिष्ठिर की दुविधा को देखकर भगवान कृष्ण, भीष्म पितामह और अन्य दिग्गजों ने उन्हें राजधर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि राजा बनना सत्ता नहीं, बल्कि देश और प्रजा की सेवा का माध्यम है। अंततः युधिष्ठिर ने यह स्वीकार किया कि न्याय और धर्म के रास्ते पर चलकर ही युद्ध के घाव भरे जा सकते हैं।
कृष्ण और भीष्म की शिक्षाओं से प्रेरित होकर युधिष्ठिर ने सिंहासन संभालने का निर्णय लिया। उनका राजतिलक हुआ और वे हस्तिनापुर के न्यायप्रिय राजा बने। उन्होंने यह प्रण लिया कि उनके शासन में छल-कपट नहीं, बल्कि धर्म और न्याय सर्वोपरि रहेगा।
महाभारत के युद्ध में दोनों पक्षों की 18 अक्षोहिणी सेनाएं आमने-सामने थीं, जिनमें लगभग 19,71,300 सैनिक शामिल थे। युद्ध के अंत तक सिर्फ 18 योद्धा ही जीवित बचे। यह भयावह विनाश युधिष्ठिर को बार-बार आत्ममंथन के लिए मजबूर करता रहा।
राजा बनने के बाद युधिष्ठिर ने सबसे पहले मजबूत प्रशासन की नींव रखी। उन्होंने योग्य और विश्वसनीय लोगों को मंत्री बनाकर जिम्मेदारियां सौंपीं, ताकि राज्य में शांति, सुरक्षा और समृद्धि बनी रहे।
युधिष्ठिर ने भीम को युवराज घोषित किया, ताकि राजा की अनुपस्थिति में वे राज्य का संचालन कर सकें। साथ ही भीम को गृह मंत्री बनाया गया, जिससे आंतरिक व्यवस्था और प्रशासन मजबूत हो।
विदुर को राजा का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया गया। उन्हें संधि, नीति और परामर्श से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी दी गई। वे युधिष्ठिर के सबसे भरोसेमंद मंत्रियों में से थे।
संजय को वित्त मंत्री बनाया गया। आय-व्यय और आर्थिक व्यवस्था की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति स्थिर बनी रहे।
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युधिष्ठिर ने भीम को दुर्योधन का महल, अर्जुन को दुःशासन का, नकुल को दुर्मर्षण का और सहदेव को दुर्मुख का महल सौंपा। अपने पूरे शासनकाल में युधिष्ठिर ने धर्म, सत्य और न्याय को ही राजकाज की नींव बनाया।






