यवतमाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी देते पैन इंडिया संस्था के संयोजक डॉ. नरसिम्हा रेड्डी (फोटो नवभारत)
Yavatmal Farmer Pesticide Poisoning Cases: महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कुछ वर्ष पहले कीटनाशक छिड़काव के दौरान हुई 23 किसानों और खेत मजदूरों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना के वर्षों बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बदली है। पैन इंडिया संस्था के संयोजक डॉ. नरसिम्हा रेड्डी ने यवतमाल में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में खुलासा किया है कि जिन घातक कीटनाशकों ने मासूमों की जान ली थी, वे आज भी बाजार में धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। सरकार द्वारा सख्त कार्रवाई के आश्वासनों के बावजूद स्थिति गंभीर बनी हुई है।
पैन इंडिया द्वारा वर्ष 2024 में यवतमाल जिले में किए गए नवीनतम सर्वेक्षण में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। डॉ. रेड्डी ने बताया कि वर्ष 2017-18 के दौरान देश भर में कीटनाशक विषबाधा के कारण लगभग 1800 लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था, जिनमें से 63 लोगों की मौत हो गई थी। संस्था ने इस मुद्दे को लेकर स्विट्जरलैंड के न्यायालय में याचिका भी दाखिल की है क्योंकि इन जहरीले कीटनाशकों में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश रसायन विदेशी कंपनियों द्वारा भारत भेजे जा रहे हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, खेत में कीटनाशक छिड़काव करने वाले किसान और मजदूर आज भी सुरक्षा के प्रति लापरवाह हैं या उन्हें पर्याप्त संसाधन नहीं मिल रहे हैं। डॉ. रेड्डी ने रेखांकित किया कि छिड़काव के दौरान ‘पीपीई किट’ (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) का इस्तेमाल लगभग न के बराबर है। सरकार और संबंधित विभागों द्वारा इन किटों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई है। सुरक्षा के अभाव में ये रसायन सीधे मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं।
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कीटनाशकों का यह संकट केवल तत्काल मौतों तक सीमित नहीं है। डॉ. रेड्डी के अनुसार, ये रसायन मानव जीवन चक्र और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। मिट्टी की उर्वरता कम होने के साथ-साथ यह जहर खाद्य श्रृंखला के माध्यम से इंसानों तक पहुंच रहा है। संवाददाता सम्मेलन में उपस्थित भाजपा नेता देवानंद पवार ने भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की। पैन इंडिया ने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण और मानव जीवन को बचाने के लिए इन घातक कीटनाशकों के उत्पादन और बिक्री पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।