डॉक्टर से ‘मरीज’ और फिर ‘मसीहा’ बनने का सफर! अवसाद को मात देकर डॉ. रेश्मा ने शुरू की जिंदगी की नई पारी
Yavatmal Health Recovery: मानसिक अवसाद और कठिन परिस्थितियों में अपनों को खोने वाली डॉ. रेश्मा कंकाल ने नंददीप फाउंडेशन और अकोला पुलिस की मदद से नई जिंदगी पाई। अब वे पुन: चिकित्सा सेवा में लौट आई हैं।
- Written By: रूपम सिंह
Yavatmal BAMS Doctor Depression Success (सौजन्य-सोशल मीडिया)
BAMS Doctor Depression Success: यवतमाल में कभी जो हाथ मरीजों का दर्द कम करते थे, वही हाथ एक समय अपनी ही पीड़ा से कांपने लगे। यह कहानी है बीएएमएस स्नातक डॉक्टर रेश्मा कंकाल की दर्द से भरी, लेकिन उम्मीद से जगमगाती एक कहानी। साल 2019 में उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया।
गहरा अवसाद, शक, डर और धीरे-धीरे वास्तविकता से दूर होती चली गई। घर में खुद को बंद कर लेना, गुड़ियों को अपना बच्चा समझकर उनसे बातें करना और अपने मासूम बच्चे को एक पेटी में बंद कर देना यह स्थिति कितनी भयावह रही होगी, इसकी कल्पना भी मुश्किल है।
एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उनके पिता की मृत्यु हो गई और उन्हें छह महीने का कारावास भी झेलना पड़ा। मां ने बयान बदलकर बेटी को बाहर निकाला, लेकिन समाज और रिश्तेदारों ने दूरी बना ली। घर अंधेरे में डूब गया बिजली कटी हुई, कचरे के ढेर, असहनीय बदबू और उसी अंधेरे में खोई हुई रेश्मा इसी कठिन समय में आगे आए अकोला खदान पुलिस स्टेशन के थानेदार मनोज केदारे उन्होंने साहस के साथ घर में प्रवेश किया। एक पेटी में बंद कुपोषित और कमजोर बच्चा मिला।
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बाल कल्याण समिति की मदद से बच्चे की तत्काल व्यवस्था की गई और रेश्मा के लिए बढ़ाया गया एक उम्मीद भरा हाथ नंददीप फाउंडेशन। नंददीप के पुनर्वसन समन्वयक निशांत शायरे अपनी टीम के साथ तुरंत पहुंचे। संदीप, नंदिनी और बबन घोडेस्वार की सेवा भावना से रेश्मा को सुरक्षित आश्रय में लाया गया।
यहीं से शुरू हुई तीन महीनों की उपचार यात्रा। मनोचिकित्सक डॉ. श्रीकांत मेश्राम के मार्गदर्शन में दवाइयां, परामर्श और निरंतर निगरानी शुरू हुई। यवतमाल के नीमा परिवार से जुड़े डॉ. प्रवीण राखुंडे ने अथक प्रयास किए उनके साथ डॉ. अग्रवाल और डॉ. कविता बोरकर ने भी निरंतर सहयोग दिया। त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. अमर सुरजुसे ने जब खाज-खुजली से पीड़ित मरीजों का इलाज करते हुए रेश्मा से कहा, तुम डॉक्टर हो, बस यही एक वाक्य उनके जीवन में नई रोशनी बनकर आया। सुबह सात से दस बजे तक वह नियमित सेवा करने लगीं।
घाव साफ करना, ड्रेसिंग करना, रोज 60-70 मरीजों की जांच करना। धीरे-धीरे उनमें आत्मविश्वास लौटने लगा। पुलिस कर्मचारी महेश कलसकर के व्यायाम सत्रों से शरीर में स्फूर्ति आई और मार्गदर्शक नरेंद्र पवार की प्रेरणा से मन मजबूत हुआ। रेश्मा अब ‘मरीज’ नहीं रहीं, बल्कि फिर से ‘सेविका’ बन गईं। नंददीप ही उनका खोया हुआ घर बन गया।
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प्रयास और मानवता की सेवा की मिसाल
- महा पुनर्वसन विदाई समारोह में नगराध्यक्ष प्रियदर्शनी उईके सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। 35 लोगों की सम्मानपूर्वक घर वापसी के साथ रेश्मा का भी नया जीवन आरंभहुआ। अकोला पहुंचने पर थानेदार मनोज केदारे की आंखें नम हो गई।
- मां और भाई उन्हें गले लगाकर रो पड़े। केदारे ने कहा नंददीप खोए हुए लोगों का घर है। विदा लेते समय रेश्मा ने संदीप और नंदिनी के चरण छुए और कहा आप लोग भगवान है। आपने मुझे पुनर्जन्म दिया।
- यह कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की नहीं है, यह विश्वास, निरंतर प्रयास और मानवता की सेवा की मिसाल है। नददीप फाउंडेशन के इस कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला।
