यवतमाल: रेलवे कर्मियों के 952 जर्जर मकानों वाली जमीन अधिग्रहण की तैयारी
Abandoned Quarters Land Acquisition: दिग्रस में रेलवे कॉलोनी के 952 जर्जर मकानों की जमीन अधिग्रहित करने की तैयारी चल रही है। करोड़ों की सरकारी संपत्ति बर्बाद होने पर स्थानीय लोगों में भारी विरोध है।
- Written By: केतकी मोडक
दिग्रस रेलवे स्टेशन (सोर्स - सोशल मिडिया)
Yavatmal Railway Land Acquisition News: रेलवे कर्मचारियों की सहूलियत के लिए कभी करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च कर बसाई गई रेलवे कॉलोनी आज पूरी तरह से बदहाली, खंडहर और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार बन चुकी है। दशकों पहले रेल कर्मियों के रहने के लिए सुव्यवस्थित ढंग से बनाए गए करीब 952 क्वार्टर अब सालों से खाली पड़े-पड़े धूल खा रहे हैं।
इस बीच, विभाग के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के अनुसार, अब इन जर्जर घरों को ढहाकर इस बेहद कीमती सरकारी जमीन को किसी अन्य परियोजना के लिए अधिग्रहित किए जाने की चर्चाएं अचानक तेज हो गई हैं। इस संभावित प्रशासनिक फैसले ने स्थानीय नागरिकों और रेल कर्मचारियों के बीच चिंता और भारी असंतोष का माहौल पैदा कर दिया है।
लापरवाही ने बना दिया ‘भूतिया खंडहर’
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, रेलवे विभाग ने अपने मैदानी और तकनीकी कर्मचारियों को बेहतर जीवन स्तर देने के उद्देश्य से इस आधुनिक सुविधाओं से युक्त आवासीय परिसर का निर्माण कराया था। इस बड़ी हाउसिंग परियोजना पर जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए थे, ताकि कर्मचारियों को कार्यस्थल के नजदीक ही सुरक्षित और सर्वसुविधायुक्त आवास मिल सके।
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लेकिन समय के चक्र और विभागीय अधिकारियों की घोर लापरवाही के चलते इन सरकारी मकानों की सुध लेना पूरी तरह बंद कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि रखरखाव और मरम्मत के अभाव में आज इस विशाल कॉलोनी के अधिकांश मकान पूरी तरह उजाड़ और डरावनी अवस्था में पहुंच चुके हैं।
सैकड़ों घरों की छतें और दीवारें दरक कर टूट चुकी हैं, कीमती खिड़कियां-दरवाजे असामाजिक तत्वों द्वारा क्षतिग्रस्त या चोरी कर लिए गए हैं, जबकि पूरे परिसर में इंसान कम और जहरीली झाड़ियां, आवारा पशु तथा गंदगी का साम्राज्य ज्यादा नजर आता है।
नई योजनाओं पर दोबारा धन की बर्बादी क्यों?
स्थानीय बुजुर्गों और जागरूक नागरिकों का साफ तौर पर कहना है कि यदि रेलवे के निर्माण और संपदा विभाग ने इन घरों की समय पर मामूली मरम्मत और डेंटिंग-पेंटिंग भी कराई होती, तो आज यह पूरी कॉलोनी फिर से गुलजार हो सकती थी और सैकड़ों रेल कर्मियों को किराए के मकानों में नहीं भटकना पड़ता। लेकिन विभागीय उदासीनता ने करोड़ों की राष्ट्रीय संपत्ति को कबाड़ में तब्दील कर दिया।
अब जब इस पूरी प्राइम लोकेशन वाली जमीन को किसी नए प्रोजेक्ट के नाम पर अधिग्रहित करने की सुगबुगाहट शुरू हुई है, तो लोगों के मन में तीखे सवाल उठने लगे हैं। नागरिकों का पूछना है कि जब सरकार के पास पहले से ही बने-बनाए 952 पक्के मकान उपलब्ध हैं, तो उन्हें उपयोग में लाने के बजाय जमींदोज करने और नई योजनाओं के नाम पर फिर से नए टेंडर निकालकर सरकारी धन की फिजूलखर्ची करने का क्या तुक है?
जमीन हड़पने के बजाय गरीबों और जरूरतमंदों को सौंपें आवास
इस पूरे मामले को लेकर दिग्रस शहर के स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और श्रमिक संगठनों ने अब मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने रेलवे बोर्ड और सरकार से पुरजोर मांग की है कि इस बेशकीमती जमीन के अधिग्रहण या व्यावसायिक उपयोग की किसी भी योजना से पहले, प्रशासन इन 952 खाली पड़े मकानों को लेकर अपनी वास्तविक और स्पष्ट नीति जनता के सामने घोषित करे।
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प्रदर्शनकारियों ने एक व्यावहारिक विकल्प सुझाते हुए कहा कि यदि ये मकान तकनीकी जांच में रहने योग्य पाए जाते हैं, तो इनका तुरंत जीर्णोद्धार किया जाए और इन्हें तत्काल आवासहीन रेल कर्मचारियों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अत्यंत गरीब परिवारों या बेघर जरूरतमंद लोगों को बहुत ही कम किराए पर आवंटित कर दिया जाए। ऐसा करने से करोड़ों रुपये की इस राष्ट्रीय संपत्ति को पूरी तरह बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा।
साथ ही, नागरिकों ने इस पूरी योजना के फ्लॉप होने और सरकारी धन के दुरुपयोग की एक उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराने की भी मांग उठाई है, ताकि दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सके।
