वर्धा के बोर बाघ परियोजना में दूसरी बार अंडों से चूजों के निकलने की पुष्टि ‘ग्रे-हेडेड फिश ईगल’ का सफल प्रजनन
Wardha News: वर्धा के बोर बाघ परियोजना में दुर्लभ 'ग्रे-हेडेड फिश ईगल' ने लगातार दूसरी बार सफल प्रजनन किया है। जलाशय के पास सुरक्षित घोंसले में दो चूजों के जन्म ने जैव विविधता की मजबूती को दर्शाय है।
- Written By: रूपम सिंह
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया)
Wardha Bor Tiger Reserve Biodiversity News: वर्धा के दुर्लभ एवं संरक्षित पक्षी प्रजाति के रूप में पहचाने जाने वाले ‘करड्या डोक्याचा मत्स्य गरुड (ग्रे-हेडेड फिश ईगल)’ ने वर्धा जिले के बोर व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में एक बार फिर सफल प्रजनन किया है। लगातार दूसरी बार इस पक्षी द्वारा अंडे देने और उनसे चूजों के निकलने की पुष्टि हुई है, जिसे वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अत्यंत उत्साहजनक माना जा रहा है। इससे पूर्व नवंबर 2025 में इसी क्षेत्र में इस गरुड़ ने एक पेड़ पर घोंसला बनाकर दो अंडे दिए थे, जिनसे दो चूजों का जन्म हुआ था।
अब पुनः उसी क्षेत्र में दो अंडे देने के बाद उनसे चूजों के बाहर निकलने का अवलोकन किया गया है। यह घटना बोर व्याघ्र परियोजना की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है। ग्रे-हेडेड फिश ईगल मुख्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्र क्षेत्रों और जलाशयों के आसपास पाया जाने वाला शिकारी पक्षी है।
इसका सिर राखी रंग का, शरीर गहरे भूरे रंग का तथा पेट और पैर सफेद होते – हैं। लंबी, मुड़ी हुई चोंच और हल्के पीले रंग की आंखें इसकी प्रमुख पहचान हैं। यह पक्षी मछली पकड़ने में अत्यंत निपुण होता है। बोर व्याघ्न परियोजना क्षेत्र में – स्थित जलाशय, मछलियों की भरपूर उपलब्धता और ऊंचे वृक्ष इस पक्षी के लिए अनुकूल आवास प्रदान करते हैं।
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सुरक्षित वातावरण में चूजों का पालन-पोषण
गरुड़ ने जलाशय के पास एक ऊंचे पेड़ पर टहनियों से मजबूत घोंसला बनाया है, जहां सुरक्षित वातावरण में चूजों का पालन-पोषण हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार आईयूसीएन रेड लिस्ट में ‘नियर थेटेंड’ श्रेणी में शामिल इस पक्षी का लगातार प्रजनन होना क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का सकारात्मक संकेत है। भविष्य में इस प्रजाति के संरक्षण के लिए और अधिक प्रभावी उपाय लागू करने की आवश्यकता भी जताई गई है।
