महिला आरक्षण से उलट-पलट! मीरा-भाईंदर में महापौर पद पर सियासी भूचाल, हिंदी बनाम मराठी पर घमासान तेज
Thane News: मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के महापौर पद के लिए 'महिला सामान्य वर्ग' का आरक्षण घोषित होते ही राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। BJP में दावेदारों की होड़ के बीच भाषा आधारित राजनीति भी तेज हो गई है।
- Written By: आकाश मसने
मीरा भाईंदर मनपा (सोर्स: सोशल मीडिया)
Mira Bhayandar Mayor Reservation: ठाणे के महत्वपूर्ण उपनगर मीरा-भाईंदर में राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। महापौर पद के लिए आरक्षण की हालिया घोषणा ने जहाँ कई दिग्गज पुरुष पार्षदों के अरमानों पर पानी फेर दिया है, वहीं भाजपा के भीतर अनुभवी और नए चेहरों के बीच खींचतान शुरू हो गई है। आगामी फरवरी माह शहर के भविष्य के लिए निर्णायक होगा।
आरक्षण की लॉटरी ने इस बार मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के शीर्ष पद को ‘सामान्य वर्ग की महिला’ के लिए सुरक्षित कर दिया है। इस फैसले के बाद से ही शहर के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। विशेष रूप से वे पुरुष नगरसेवक जो वर्षों से इस कुर्सी का सपना देख रहे थे, अब अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार, अंतिम मुहर पार्टी के संसदीय बोर्ड की सलाह पर विधायक नरेंद्र मेहता द्वारा लगाई जाएगी।
भाषा के मुद्दे पर बढ़ी सियासी रार
मीरा भाईंदर की राजनीति में इस बार केवल विकास ही नहीं, बल्कि ‘अस्मिता’ भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। मराठी एकीकरण समिति और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने स्पष्ट रुख अपना लिया है। संगठनों का कहना है कि यदि इस बार मराठी भाषी चेहरे को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो विरोध उग्र हो सकता है। दूसरी ओर, शहर की बड़ी हिंदी भाषी आबादी अपने प्रतिनिधित्व की उम्मीद लगाए बैठी है, जिससे भाजपा नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
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दावेदारों की लंबी फेहरिस्त
नगरसेविकाओं के बीच इस पद को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। जहां पूर्व महापौर ज्योत्सना हसनाले, निर्मला सावले और डिंपल मेहता का अनुभव पार्टी के काम आ सकता है, वहीं कई नए नाम भी रेस में शामिल हैं।
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कौन है प्रमुख दावेदार?
मराठी भाषी: अनीता पाटील, नयना म्हात्रे, वंदना पाटील।
हिंदी व अन्य भाषी: शानू गोहिल, स्नेहा पांडे, सुनीता जैन, दीपिका अरोड़ा, नीला सोंस, हेतल परमार और वर्षा भानुशाली।
फरवरी में होगा फैसला?
क्या भाजपा नेतृत्व क्षेत्रीय भावनाओं और भाषाई संतुलन को साध पाएगा? या फिर एक बार फिर अनुभव को ही प्राथमिकता दी जाएगी? शहरवासियों की निगाहें फरवरी के पहले सप्ताह पर टिकी हैं, जब इस सस्पेंस से पर्दा उठेगा।
