त्याग की मिसाल थे अजित पवार, चाचा के लिए सांसदी छोड़ महाराष्ट्र को बनायी कर्मभूमि, 1991 की वो अनसुनी कहानी

Ajit Pawar Sacrifice: अजित पवार के राजनीतिक त्याग की अनसुनी कहानी। जब 1991 में चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी थी सांसद की कुर्सी। जानें कैसे एक इस्तीफे ने बदली महाराष्ट्र की सियासत।
The untold story of Ajit Pawar’s 1991 political sacrifice. Why he resigned from the Lok Sabha for Sharad Pawar and shaped Maharashtra's politics forever.
त्याग की मिसाल अजित पवार (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

1991 Baramati Election: महाराष्ट्र की सियासत में अजित पवार का नाम आज एक ऐसे कद्दावर नेता के रूप में दर्ज है, जो अपनी बेबाकी और कड़े प्रशासनिक अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, उनके राजनीतिक सफर के पन्नों को पलटने पर एक ऐसा अध्याय सामने आता है।

जो सत्ता के प्रति उनके समर्पण नहीं, बल्कि अपने चाचा शरद पवार के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और त्याग को दर्शाता है। यह वाकया साल 1991 का है, जिसने न केवल अजित पवार के भविष्य की दिशा तय की, बल्कि पवार परिवार की राजनीतिक विरासत को भी एक नई मजबूती प्रदान की।

बिना संकोच के छोड़ दी लोकसभा सीट

उस समय अजित पवार बारामती लोकसभा क्षेत्र से भारी मतों से जीतकर संसद पहुंचे थे। पवार परिवार की नई पीढ़ी के रूप में उन्होंने दिल्ली की राजनीति में कदम रखा ही था कि देश के राजनीतिक समीकरणों में तेजी से बदलाव आया। तत्कालीन परिस्थितियों में शरद पवार को संसद में प्रवेश करने के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय सीट की आवश्यकता थी। ऐसे नाजुक मोड़ पर, अजित पवार ने बिना किसी देरी या संकोच के अपने चाचा के लिए लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। भारतीय राजनीति में, जहां एक अदद पद के लिए लंबी खींचतान होती है, वहां एक युवा सांसद द्वारा अपनी जीती-जाताई सीट छोड़ देना एक असाधारण और साहसी निर्णय था।

दोबारा नहीं लड़ा लोकसभा का चुनाव

संसद से इस्तीफे के बाद उन्होंने बारामती विधानसभा क्षेत्र की कमान संभाली और वहां से विधायक चुनकर राज्य सरकार में अपनी सक्रिय भूमिका शुरू की। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और कभी दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा भी नहीं जताई।

जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क

इस त्याग के बाद अजित पवार ने खुद को पूरी तरह से महाराष्ट्र की राजनीति और संगठन की मजबूती के लिए समर्पित कर दिया। जब शरद पवार दिल्ली में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र बने हुए थे, तब अजित पवार ने पुणे जिले और राज्य के ग्रामीण इलाकों में पार्टी की जड़ें जमाने का जिम्मा संभाला। उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया, जिसने उन्हें राज्य की राजनीति का एक अपरिहार्य चेहरा बना दिया।

उनका त्याग आज भी चर्चा का विषय

उनका पूरा ध्यान राज्य के प्रशासन, सहकारिता क्षेत्र और विकास कार्यों पर केंद्रित हो गया। अक्सर अजित पवार के बाद के राजनीतिक निर्णयों और गठबंधनों पर चर्चा होती रहती है, लेकिन उनके करियर का यह शुरुआती 'त्याग' आज भी उनकी शख्सियत के उस पहलू को उजागर करता है, जहां परिवार और नेतृत्व का आदेश व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर था।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com