वसई विरार में ऑटो रिक्शा समस्या (सोर्स: AI)
Vasai Virar Rickshaw Permit Ban: कभी विकास की दौड़ शामिल पालघर जिले का वसई-विरार आज ऑटो रिक्शाओं के बेतहाशा बोझ तले कराह रहा है। शहर की लाइफ लाइन कहे जाने वाले ये तीन पहिए अब आम जनता के लिए जी का जंजाल बन गए हैं। एक साल के भीतर बांटे गए 1307 नए परमिटों ने रही-सही कसर पूरी कर दी है, जिससे पूरा शहर एक विशाल ट्रैफिक जाम में तब्दील होता नजर आ रहा है।
परिवहन विभाग के आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। वर्ष 2025-26 के दौरान जिस रफ्तार से नए लाइसेंस बांटे गए, उसके मुकाबले सड़कों का विस्तार रत्ती भर भी नहीं हुआ। विरार, नालासोपारा और वसई जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में अब पैदल चलना भी दूभर हो गया है। रेलवे स्टेशनों के बाहर रिक्शा चालकों का कब्जा इस कदर है कि एम्बुलेंस को भी रास्ता मिलना मुश्किल हो जाता है।
देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर, महाराष्ट्र सरकार ने अब स्थिति की गंभीरता को समझा है। 9 मार्च 2026 से नए रिक्शा लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया है। परिवहन विभाग अब ‘शहर की वहन क्षमता का अध्ययन करेगा, रोजगार और सुविधा के नाम पर शहर को कबाड़खाना नहीं बनाया जा सकता है। यदि प्रशासन ने लाइसैस निलंबन के साथ-साथ कड़ाई से यातायात नियमों को लागू नहीं किया, तो वसई-विरार की सड़कें पूरी तरह ‘लॉकडाउन’ की स्थिति में पहुंच जाएंगी। अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है।
वसई-विरार शहर में केवल रिक्शाओं की संख्या बढ़ी है, बुनियादी सुविधाएं नहीं। पूरे क्षेत्र में मात्र 4 से 5 सीएनजी पंप चालू हालत में हैं। गैस भरवाने के लिए हजारों रिक्शा आते हैं, जिनकी पंपों पर लंबी कतारें लगती हैं, जो किसी कुरुक्षेत्र’ के युद्ध से कम नहीं लगती। चालकों को गैस के लिए 4 से 6 घंटे लाइन में लगना पड़ता है। ईंधन के लिए चालकों को फाउंटेन या घोड़बंदर हाईवे तक दौड़ लगानी पड़ रही है।
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स्थानीय निवासी दीपक शर्मा ने बताया कि प्रशासन ने बिना किसी नियोजन के लाइसेंस बांट दिए और अब भुगतना जनता को पड़ रहा है। अवैध पार्किंग और दबंगई के खिलाफ अब आर-पार की लड़ाई जरूरी है।