येवला में प्याज संकट: किसान फसल भेड़ों को खिला रहे, 400 रु. भाव, 80 हजार लागत: किसानों की टूटती कमर

Yeola Onion Price Crash: प्याज के गिरते दामों से हताश येवला के किसान फसल भेड़ों को खिला रहे हैं। 70–80 हजार लागत के बाद भी 400–1000 रुपये का भाव मिल रहा है।
Onion crisis in Yeola: Farmers are feeding their crops to sheep, price is Rs. 400, cost of cultivation is Rs. 80,000: Farmers are facing financial ruin
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया AI )
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Yeola Onion Farmer Protest: येवला एक ओर प्याज के दामों में आई भारी गिरावट ने उत्पादक किसानों को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है। दो दिन पूर्व येवला-कोपरगांव राजमार्ग पर किसानों द्वारा किए गए 'रास्ता रोको' आंदोलन के बाद अब स्थिति और भी गंभीर हो गई है।

बाजार में मिल रहे दाम से परिवहन का खर्च भी न निकलने के कारण हताश किसानों ने अपनी फसल भेड़ों को चराने का निर्णय लिया है। तहसील के तांदुलवाड़ी निवासी श्रीराम शिंदे, प्रेमराज शिंदे और बाजीराव शिंदे सहित अनेक किसानों ने प्याज मंडी ले जाने के बजाय खेतों में फैलाकर पशुओं को खिला दिया।

मौसम में बदलाव के प्रभावित हुई फसल लागत और उत्पादन का बिगड़ा गणित येवला तहसील प्याज उत्पादन के लिए जानी जाती है, जहाँ रांगड़ा, पोल और उन्हाली प्याज की बड़े पैमाने पर खेती होती है।

इस वर्ष अनुकूल वर्षा के बावजूद मौसम में बदलाव और बीमारियों के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। किसानों ने बीजों, महंगी कीटनाशकों, उर्वरकों और मजदूरी पर प्रति एकड़ औसतन 70 से 80 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन हाथ में मात्र 40 से 50 क्विंटल उत्पादन ही आया। वर्तमान में बाजार में 400 से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है, जिससे लागत निकलना भी असंभव हो गया है।

कर्ज के बोझ से दबे हैं किसान

कर्ज के जाल में फंसता अन्नदाता इलाके में चारे की कमी के कारण अब प्याज के खेत चरागाह में तब्दील हो रहे है। व्यथित किसानों का कहना है कि 15 दिन पहले तक स्थिति फिर भी संभली हुई थी, लेकिन अब गिरते दामों ने उनकी कमर तोड़ दी है।

कर्ज के बोझ तले दबे किसान अब मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। किसानों ने मांग की है कि सरकार तुरंत हस्तक्षेप कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करे, सीधी खरीद केंद्र शुरू करे और निर्यात को बढ़ावा देते हुए आर्थिक मुआवजे की घोषणा करे।

प्याज को कौड़ियों के भाव बेचने पर लागत भी वसूल नहीं हो रही है। मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी जेब से देना पड़ रहा है। इसलिए हमने फसल भेड़ों को खिलाने का फैसला किया है।

-तांदुलवाड़ी, वैशाली शिंदे

हमारा पूरा जीवन खेती पर निर्भर है। इस साल पूंजी निकलना भी मुश्किल है। ऐसे में औने-पौने दाम पर बेचने या फेंकने से बेहतर हमने इसे भेड़ों को खिलाना समझा।

-किसान, प्रेमराज शिंदे

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