
Soybean Price Fall (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nashik News: पिछले कुछ दिनों से सोयाबीन के अच्छे दाम मिलने से उत्साहित किसानों की खुशियों पर अब ग्रहण लग गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचलों और भारत-अमेरिका के बीच हुए हालिया कृषि समझौते का असर अब घरेलू बाजार पर दिखने लगा है। प्याज के बाद अब सोयाबीन की कीमतों में अचानक 500 रुपये प्रति क्विंटल की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे सोयाबीन उत्पादक किसानों में हड़कंप मच गया है। लासलगाव कृषि उपज बाजार समिति में पिछले सप्ताह सोयाबीन के दाम 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गए थे। हालांकि, महज कुछ ही दिनों में इसमें बड़ी गिरावट आई और भाव घटकर 5,300 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए।
इस अचानक हुई मंदी से बाजार में भ्रम और चिंता की स्थिति बनी हुई है। बेहतर कीमतों की उम्मीद में कई किसानों ने अपना स्टॉक रोक रखा था, लेकिन अब कीमतों के गिरने से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि खाद, बीज, मजदूरी और परिवहन लागत को देखते हुए मौजूदा भाव बिल्कुल भी किफायती नहीं हैं।
किसानों का आरोप है कि भारत-अमेरिका के नए कृषि समझौते के कारण आयात बढ़ने की आशंका है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतें गिर रही हैं। किसानों ने मांग की है कि सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य तुरंत बढ़ाकर 6,000 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए और कीमतों को प्रभावित करने वाले विदेशी समझौतों को रद्द किया जाए।
वाहेगाव साल चांदवड़ के सोयाबीन उत्पादक ज्ञानेश्वर घुले ने कहा कि लगातार बारिश के कारण सोयाबीन की उत्पादन लागत पहले ही बढ़ चुकी है। मौजूदा बाजार भाव से कोई लाभ नहीं हो रहा है। सरकार को समर्थन मूल्य 6,000 रुपये से अधिक करना चाहिए और भारत-अमेरिका समझौता रद्द करना चाहिए।
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थेटाले, निफाड के सोयाबीन उत्पादक कृष्णा शिंदे ने कहा कि प्याज के बाद अब सोयाबीन के दाम भी गिर रहे हैं। यदि केंद्र और राज्य सरकार समय पर हस्तक्षेप नहीं करती, तो किसान कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाएगा।
लासलगाव बाजार समिति के निर्यातक नंदकुमार डागा ने कहा कि भारत-अमेरिका समझौते का असर अब फसलों पर दिख रहा है। सोयाबीन के साथ-साथ मक्का के दाम भी प्रभावित हो रहे हैं। केंद्र सरकार को किसानों और व्यापारियों को विश्वास में लेकर निर्णय लेना चाहिए। इस अस्थिरता से व्यापारियों को भी भारी नुकसान हो रहा है।






