

Nashik News: आदिवासी आश्रमशालाओं में बाह्यस्रोत (आउटसोर्सिंग) से भर्ती करने के विभाग के फैसले का पहला शिकार हुआ है। पेठ तहसील के बोरवड आश्रमशाला के चतुर्थ श्रेणी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी, गौरव विक्रम अहिरे (२१) ने अपनी नौकरी खोने के गम में जहर खाकर आत्महत्या कर ली। पिछले ढाई महीने से चल रहे 'बिऱ्हाड आंदोलन' (डेरा डालकर विरोध प्रदर्शन) में वह भी शामिल थे।
अब आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया है कि आदिवासी विभाग की नीतियों ने यह जान ली है, जिससे बाह्यस्रोत भर्ती का फैसला सवालों के घेरे में आ गया है। आदिवासी विकास विभाग ने आश्रमशालाओं में प्रति घंटा और दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को हटाकर उनकी जगह १७९१ पदों को बाह्यस्रोतों से भरने का निर्णय लिया है।
इसी फैसले के खिलाफ 'बिऱ्हाड आंदोलन' के प्रदर्शनकारी पिछले ढाई महीने से आयुक्त कार्यालय के बाहर आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन में शामिल गौरव अहिरे ने नौकरी जाने के सदमे में १६ सितंबर को जहर खा लिया था। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए 'मविप्र' अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चार दिनों तक उनका इलाज चला, लेकिन शुक्रवार की रात उनकी मृत्यु हो गई। शादी से पहले मौत को गले लगाया: अहिरे के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। इसी बीच, दिवाली में उनकी शादी तय हो गई थी।
ऐसे में, दैनिक वेतन पर मिलने वाली नौकरी जाने से उनका परिवार बहुत निराश हो गया था। आंदोलनकारियों का दावा है कि इसी निराशा में उन्होंने यह घातक कदम उठाया। उन्होंने 'बिऱ्हाड आंदोलन' के मुंबई प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर आंदोलनकारियों की पीड़ा व्यक्त की थी। लेकिन, विभाग और सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी, और आखिरकार उन्होंने मौत को गले लगा लिया।
आश्रमशाला दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष ललित चौधरी ने कहा कि गौरव अहिरे आदिवासी विभाग की गलत नीतियों का शिकार हुआ है। आदिवासी विभाग और कितने लोगों की जान लेगा? इस घटना से सबक लेते हुए, विभाग को बाह्यस्रोत भर्ती का फैसला तुरंत रद्द कर देना चाहिए।