प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Nashik Municipal Corporation: नासिक स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनावों को राजनीति की पहली सीड़ी माना जाता है, जहां से विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा की राजनीति का शिक्षा ली जाती है। ग्राम पंचायत से संसद भवन तक का यह सफर कई राजनेताओं के लिए मील का पत्थर साबित होता है।
नासिक महानगर ने ऐसे कई चेहरे देखे हैं, जिन्होंने एक पार्षद के रूप में अपना करियर शुरू किया और सीधे संसद तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की। नासिक महानगरपालिका के इतिहास में लगभग एक दर्जन ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने नगरसेवक से शुरुआत कर विधायक, मंत्री और सांसद बनने का गौरव प्राप्त किया।
यह उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि स्थानीय राजनीति कितनी प्रभावशाली हो सकती है। हालांकि, नासिक में कुछ अपवाद भी रहे हैं। स्वर्गीय गणपतराव काठे पहले विधायक बने और बाद में पार्षद।
स्वर्गीय शांताराम बापू वावरे पहले विधानसभा के सदस्य रहे और बाद में पार्षद व मेयर बने। वहीं, डॉ. प्रतापदादा सोनवणे सांसद और विधायक तो रहे, लेकिन कभी पार्षद नहीं बन पाए।
दूसरी ओर, शहर में ऐसे कावर नेताओं की भी कमी नहीं है जिन्होंने कई बार पार्षद, उपमहापौर, महापौर या स्थायी समिति सभापति जैसे महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया, लेकिन विधानसभा वा विधान परिषद के द्वार उनके लिए बंद रहे, दशरथ पाटिल, विनायक पांडे, अजय बोरस्ते, बाबा सदमुल और अशोक दिये जैसे नेताओं ने निगम की राजनीति में सर्वोच्च पद संभाले, लेकिन उच्च सदनों के चुनावों में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
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इसी तरह दिनकर आढाव, सुधाकर बडगुजर, दिनकर पाटिल, गणेश गिते, दिलीप दातीर, हेमलता पाटिल और शाहू सौरे जैसे नेता भी अब तक विधानसभा की दहलीज नहीं लाध पाए है। गांव से संसद तक के इस सफर में पार्टी के समीकरण, जातीय गणित, नेतृत्व क्षमता के अवसर महत्वपूर्ण होते है।