अंडरपास निर्माण के लिए कितनी ली मंजूरियां, हाई कोर्ट ने महामेट्रो से मांगा हलफनामा

Zero Mile Underpass Issue:जीरो माइल अंडरपास निर्माण पर हाई कोर्ट ने महामेट्रो से आवश्यक मंजूरियों का विस्तृत हलफनामा मांगा। रक्षा विभाग की अनुमति न होने पर अदालत ने चिंता जताई।
अंडरपास निर्माण के लिए कितनी ली मंजूरियां
अंडरपास निर्माण के लिए कितनी ली मंजूरियां (सौजन्यः सोशल मीडिया)
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Nagpur News: मानस चौक से बर्डी और सिविल लाइन्स की ओर तथा सिविल लाइन्स से मानस चौक की दिशा में आने-जाने के दौरान जीरो माइल पर अक्सर भारी ट्रैफिक जाम की स्थिति बनती है। इससे निपटने के लिए सरकार ने अंडरपास निर्माण की घोषणा की थी। लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई प्रस्तावित होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता जयदीप दास ने आपत्ति जताई और इस मामले में हाई कोर्ट से संज्ञान लेने का अनुरोध किया।

याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि अंडरपास निर्माण के लिए अब तक कितनी आवश्यक मंजूरियां ली गई हैं, इसका विस्तृत हलफनामा महामेट्रो दाखिल करे। महामेट्रो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.के. मिश्रा और मनपा की ओर से अधिवक्ता जैमीनी कासट ने पैरवी की। इससे पहले, कोर्ट ने अंडरपास निर्माण के लिए आवश्यक रक्षा विभाग की अनुमति न लेने और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने को लेकर गंभीर चिंता भी व्यक्त की थी।

रक्षा विभाग की अनुमति का मुद्दा

पिछली सुनवाई में अदालत मित्र ने बताया कि रक्षा विभाग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि इस परियोजना के लिए अनुमति का कोई आवेदन नहीं किया गया है। प्रस्तावित अंडरपास रक्षा परिसर की भूमि के काफी निकट से गुजरता है। सीताबर्डी किले से 6.1 मीटर और दक्षिण अंसारी रोड से 2.4 मीटर की दूरी पर। चूंकि यह दूरी 100 मीटर से कम है, इसलिए रक्षा विभाग की अनुमति अनिवार्य है। इस पर महामेट्रो के वरिष्ठ अधिवक्ता एस.के. मिश्रा ने तर्क दिया कि मेट्रो केवल कार्यान्वयन एजेंसी है; अतः अनुमति प्राप्त करना राज्य सरकार का दायित्व है। कोर्ट ने अदालत मित्र को निर्देश दिया है कि अंडरपास निर्माण के लिए आवश्यक सभी अनुपालनों की विस्तृत चेकलिस्ट तैयार करें।

जनता के पैसों की बर्बादी की आशंका

राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील ने कहा कि सभी आवश्यक मंजूरियां हासिल करना कार्यान्वयन एजेंसी यानी मेट्रो की जिम्मेदारी है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोप रहे हैं।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद यदि रक्षा विभाग की अनुमति आवश्यक हुई और न मिली, तो इससे जनता के पैसों की भारी बर्बादी हो सकती है। अदालत ने याद दिलाया कि अंडरपास निर्माण की अनुमति इस स्पष्ट शर्त पर दी गई थी कि सभी कानूनी और विभागीय अनुपालनों को पूरा करने के बाद ही कार्य शुरू किया जाएगा।

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