
चंद्रशेखर बावनकुले-अनिल देशमुख-सुनील केदार (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Local Body Elections: स्थानीय निकाय चुनावी रण में खुद को एक दूसरे का मित्र बताने वाले दल अब आपस में ही भिड़ने वाले हैं। फिर चाहे वह भाजपानीत महायुति हो या कांग्रेसनीत मविआ। कुछ सीटों को छोड़ दें तो नगर परिषद व नगर पंचायत चुनाव में 90 फीसदी सीटों पर सभी ने अपने-अपने स्वतंत्र उम्मीदवार उतार दिये हैं।
बड़ी पार्टियों के साथ हमेशा खड़े रहे छोटे दल उनके अड़ियल रवैये के चलते अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मैदान पर उन्हें चुनौती देते नजर आ रहे हैं। महायुति में भाजपा ने जिले की सभी 27 नप-नपं अध्यक्ष पदों के साथ ही सदस्यों को मैदान पर उतार दिया है तो सरकार में शामिल शिंदे सेना ने 15 और राकां अजित पवार गट ने भी 15 नगराध्यक्षों के साथ सदस्य मैदान में उतार दिए हैं। तीनों दलों के उम्मीदवार एक दूसरे से भिड़ेंगे।
वहीं कांग्रेस ने 23 नगराध्यक्ष उतारे हैं। 1 सीट पर गठबंधन किया है और राकां शरद पवार की वजनदारी वाली 3 सीट छोड़ दी है। मविआ में शामिल राकां शरद पवार पार्टी ने 11 नप-नपं में अध्यक्ष उम्मीदवार दिये हैं। वहीं शिवसेना उद्धव ठाकरे ने भी 11 सीटों पर अध्यक्ष के उम्मीदवार सहित अपना स्वतंत्र पैनल उतारा है।
भाजपा नेताओं की ओर से अंत तक यही कहा जाता रहा कि निकाय चुनाव महायुति एक साथ लड़ेगी। लेकिन उसने मित्र दलों को सकारात्मक जवाब नहीं दिया और अपने प्रभाव वाली 15 सीटों पर राज्य मंत्री आशीष जायसवाल, कृपाल तुमाने ने अपने स्वतंत्र उम्मीदवार उतार दिये। वहीं 15 सीटों पर राकां अजित पवार गुट ने भी बिगुल फूंक दिया है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और जिले में उसके 6 में से 5 विधायक हैं।
वजनदार मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के नेतृत्व में यह चुनाव लड़ा जा रहा है। वे पूरे राज्य के चुनाव प्रभारी हैं और अपने गृह जिले में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है। गठबंधन नहीं होने के चलते इस चुनाव में लगभग सभी सीटों पर मित्र दल ही उनकी प्रतिष्ठा में पलीता लगाने का प्रयास करेंगे। चूंकि यह चुनाव राज्य मंत्री आशीष जायसवाल के लिए अपनी पार्टी की ताकत बरकरार रखने के साथ बढ़ाने के लिए भी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए वे भी चुप नहीं बैठने वाले हैं।
विधानसभा चुनाव सीट खोने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता सुनील केदार के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। अधिक से अधिक सीटों पर अगर कब्जा जमाने में सफल हुए तो ही आगामी जिला परिषद चुनाव के लिए चित्र स्पष्ट हो पाएगा। जिप में उनके गुट का एकतरफा कब्जा था जिसमें वापसी उनकी वजनदारी बनाए रखने के लिए अनिवार्य हो गई है।
कांग्रेस को चुनौती देने के लिए भाजपा के साथ महायुति के मित्र दल तो मैदान पर हैं ही, साथ ही 11 सीटों पर राकां शरद पवार और 11 पर शिवसेना यूबीटी ने भी उम्मीदवार उतारे हैं। कौन किसके लिए सिरदर्द बनता है यह तो परिणाम बताएगा लेकिन कांग्रेस में गुटबाजी व टिकट वितरण को लेकर लगे आरोपों व नाराजी के चलते पार्टी को नुकसान हो सकता है। इसे वे अपने सहयोगियों के साथ कैसे संभालते हैं, यह देखने वाली बात होगी।
रामटेक में शिंदे सेना ने भी भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा है। वहीं कांग्रेस इस बार अपने निष्ठावान कार्यकर्ता दामोदर धोपटे को साइट कर प्रहार जनशक्ति पार्टी के रमेश कारेमोरे को टिकट दी। धोपटे ने निर्दलीय नामांकन दर्ज किया है। अगर वे अपना नाम वापस नहीं लेते तो निश्चित रूप से कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के वोट कांटेंगे।
इससे रामटेक में सीधी टक्कर 2 मित्र दलों भाजपा व शिंदे सेना के बीच ही होगी। यह सीट राज्य मंत्री जायसवाल की है इसलिए हॉट बन गई है। कामठी राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के लिए चुनौतीभरी हो गई है। गठबंधन नहीं होने और बीजेपी के रवैये से नाराज होकर बरिएमं की सुलेखा कुंभारे ने अपना उम्मीदवार उतार दिया है।
इस सीट में उनका खासा प्रभाव है और भाजपा उम्मीदवार को भारी नुकसान पहुंच सकता है। यहां से कांग्रेस, राकां अजित पवार गुट, शिंदे सेना, उद्धव सेना, आम आदमी पार्टी, एमआईएम, बसपा के साथ ही वंचित तक ने अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। कौन किसके वोट काटेगा, यह गणित अब समझ से परे हो गया है।
भाजपा व कांग्रेस में टिकट नहीं मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं ने कुछ सीटों से अपने नामांकन दाखिल कर दिये हैं। इन्हें समझाना और समविचारी दलों से समर्थन जुटाना दोनों ही पार्टी नेताओं के लिए टेढ़ी खीर लग रही है। सावनेर में भाजपा, कांग्रेस और राकां अजित पवार गट ने उम्मीदवार उतारे हैं। यहां अरविंद लोधी की आघाड़ी का भी वर्चस्व है।
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इसका लाभ बीजेपी को होता रहा है अब उन्हें समझाने में विधायक आशीष देशमुख सफल होते हैं या नहीं यह देखने वाली बात होगी। वही सुनील केदार की रणनीति पर भी नजर है। खापा में भाजपा ने पीयूष बरडे को टिकट दी तो नाराज कार्यकर्ता शिंदे सेना और कांग्रेस में चले गए। उम्मीदवारी का पर्चा भी दाखिल कर दिया।
वानाडोंगरी में भाजपा की पूर्व नगरसेविका महानंदा पाटिल टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर उद्धव सेना की टिकट से मैदान में उतर गईं। बूटीबोरी में कांग्रेस के दूसरे गट के पदाधिकारियों में भारी नाराजी है। कई तो दूसरी पार्टियों में चले गए। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी विधायकों, नेताओं को अपने बागियों को समझाकर नाम वापसी के लिए तैयार करना एक चुनौती ही होगा।






