पति की मौत के 7 साल बाद न्याय की उम्मीद, हाई कोर्ट ने 2,672 दिनों की देरी माफ कर अपील को दी मंजूरी
Nagpur News: हाई कोर्ट ने 2010 के एक मामले में एक विधवा महिला के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए महत्वपूर्ण फैसले में लगभग 7 साल से अधिक की असाधारण देरी को माफ कर दिया है।
- Written By: प्रिया जैस
हाई कोर्ट (सौजन्य-सोशल मीडिया)
High Court: हाई कोर्ट ने एक विधवा महिला के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए महत्वपूर्ण फैसले में 2,672 दिनों (लगभग 7 साल से अधिक) की असाधारण देरी को माफ कर दिया है। यह मामला एक चेक बाउंस से जुड़ा है जिसमें मूल शिकायतकर्ता की आकस्मिक मृत्यु के बाद निचली अदालत ने मामला खारिज कर दिया था। अब हाई कोर्ट के इस फैसले से विधवा को न्याय पाने का एक और मौका मिला है।
मामले की शुरुआत 2010 में हुई जब अजय कोहाले ने अशोक लारोकर के खिलाफ 1 लाख रुपये के चेक बाउंस का मामला दर्ज कराया था। कोहाले ने लारोकर को 1 लाख रुपये उधार दिए थे जिसकी अदायगी के लिए दिया गया चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गया था।
निचली अदालत की चूक और महिला का संघर्ष
मामला जिला सत्र न्यायालय में चल रहा था और 20 जनवरी, 2015 को कोहाले ने अपना सबूत भी पेश कर दिया था लेकिन 13 फरवरी, 2015 को एक दुखद रेल दुर्घटना में शिकायतकर्ता अजय कोहाले की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी हर्षदा कोहाले ने 29 दिसंबर, 2015 को खुद को और अपनी नाबालिग बेटी को कानूनी उत्तराधिकारी के तौर पर रिकॉर्ड पर लाने के लिए एक आवेदन दायर किया।
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आश्चर्यजनक रूप से निचली अदालत ने हर्षदा के आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया। इसके बजाय शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के कारण 14 अक्टूबर, 2016 को मामले को खारिज कर दिया गया और अभियुक्त अशोक लारोकर को बरी कर दिया गया।
ससुराल वालों से भी विवाद
पति की मृत्यु के सदमे से गुजर रहीं हर्षदा को अपने ससुराल वालों से भी विवाद का सामना करना पड़ा जिसके चलते उन्हें पुणे के दौंड में अपने पिता के घर जाना पड़ा। वित्तीय तंगी और जानकारी के अभाव में वह नागपुर आकर मामले की पैरवी नहीं कर सकीं। उन्हें 2016 में हुए इस फैसले की जानकारी बहुत बाद में मिली। दिसंबर, 2022 में उन्होंने आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त की और फिर एक पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से हाई कोर्ट में अपील दायर की।
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हाई कोर्ट ने कारणों को ‘वास्तविक’ माना
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अपील में हुई 2,672 दिनों की देरी के लिए याचिकाकर्ताओं द्वारा बताए गए कारण वास्तविक और पर्याप्त हैं। अदालत ने माना कि पति की मृत्यु, ससुराल से विवाद और वित्तीय संकट जैसी परिस्थितियों के कारण याचिकाकर्ता समय पर अपील नहीं कर सकी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत को कानूनी उत्तराधिकारियों को रिकॉर्ड पर लाने वाले आवेदन पर फैसला किए बिना मामला खारिज नहीं करना चाहिए था। इन दलीलों को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने देरी को माफ कर दिया और अपील को सुनवाई के लिए पंजीकृत करने का निर्देश दिया।
