Nagpur Sand Smuggling: सिस्टम पर सवाल, क्या सिर्फ मोहरों पर कार्रवाई, असली मास्टरमाइंड अब भी बच रहे?

Nagpur Sand Smuggling News: नागपुर में रेत तस्करी पर मकोका कार्रवाई के बाद जांच का दायरा बढ़ा। अब सिस्टम की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और बड़े मास्टरमाइंड तक पहुंचने की मांग तेज हो गई है।
Nagpur Sand Smuggling: Questions over the System—Is Action Limited to Mere Pawns, While the Real Masterminds Continue to Evade Justice?
रेत तस्करी नागपुर,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Sand Smuggling MCOCA Action: नागपुर ग्रामीण पुलिस की क्राइम ब्रांच और भिवापुर पुलिस द्वारा रेत तस्करी मामले में मकोका के तहत की गई बड़ी कार्रवाई के बाद अब जांच का दायरा बढ़ने की चर्चा तेज हो गई है। ट्रांसपोर्टर, ड्राइवर और कथित वाट्सएप ऑपरेटरों पर कार्रवाई के बीच अब सवाल मॉनिटरिंग एजेंसी, राजस्व विभाग, पुलिस और आरटीओ अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे हैं।

जीपीएस और जिओ-फेसिंग जैसी हाईटेक व्यवस्था के बावजूद बड़े पैमाने पर अवैध रेत परिवहन होने के आरोपों ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए हैं। चर्चा यह है कि यदि यह संगठित अपराध है तो फिर कब तक कल्लू और उसकी गैंग जैसे मोहरों पर मकोका लगाकर कार्रवाई सीमित की जाती रहेगी। ऐसा कहीं असली मास्टरमाइंड लोगों को बचाने के लिए तो नहीं किया जाता ?

बड़े अधिकारियों की निगरानी शुरू

रेत तस्करी के इस कथित नेटवर्क में अब मॉनिटरिंग एजेंसी और राजस्व अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। जानकारों का कहना है कि यदि जिओ-फेसिंग और जीपीएस प्रणाली का सही उपयोग किया जाता तो बिना रॉयल्टी एक भी चाहन घाट तक नहीं पहुंच सकता था। वहीं, रेत तस्करी के काले काम में केवल कल्लू की गैंग की वाट्सएप पर तस्करी का सिंडिकेट नहीं चलाती थी। पूरे विदर्भ में ऐसी कई वाट्सएप गैंग हैं जो हर दिन राज्य के राजस्व को करोड़ों का चूना लगा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मकोका की जांच केवल परिवहनकर्ताओं तक सीमित रहेगी या फिर उन अधिकारियों, एजेंसियों और अन्य वाट्सएप ग्रुप तक भी पहुंचेगी।

जब्ती न दिखाकर नियमों का खुला उल्लंघन

पिछले महीने जिला आरटीओ फ्लाइंग स्क्वाड में ओवरलोड वाहनों पर कार्रवाई तो दिखाई लेकिन उन्हें ऑनलाइन स्पाट चालान देकर छोड़ दिया। नियमानुसार, किसी भी ओवरलोड वाहन पकड़े जाने पर उसे जब्त कर पहले आरटीओ लाया जाता है। राजस्व अधिकारियों को तत्काल इसकी सूचना दी जाये। इसके बाद राजस्व अधिकारी द्वारा राजस्व मंत्री के आदेशानुसार व नियमानुसार 2.5 लाख राजस्व दंड वसूल करके बांड दिया जाये, राजस्व चालान भरने पश्चात उस गाड़ी को दूसरी गाड़ी में हाफ लोड अर्थात अंडरलोड करवा के दोनों वाहनों का क्षमतानुसार कांटा पर्ची देखकर उपसांत आरटीओ का दंड चुकाकर गाड़ी छुड़वाने का नियम है लेकिन विदर्भके जिलों में ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हो रही। कल्लू सहित कई तस्करों के वाट्सएप ग्रुप तक पुलिस पहुंची है लेकिन सरकारी अधिकारियों तक उसके लंबे हाथ पहुंचेंगे या नहीं ये तो ऊपर वालों पर निर्भर करेगा।

RTO की मेहरबानी, 3000 ट्रकों से हर दिन वसूली

रेत परिवहन से जुड़े वाहन गोंदिया, चंद्रपुर, गड़चिरौली और भंडारा से होकर नागपुर पहुंचते है लेकिन यहां दलाली का एक बड़ा नेटवर्क वसूली करता है। सूत्रों के अनुसार, इनमें स्थानीय आरटीओं के वरिष्ठ अधिकारी का पूर्व डाइवर जिशान, एक बड़े कांग्रेसी नेता के करीबी शिवा, सोनू, मुन्ना, भाजपा नेता सुरेन्द्र का भाई शक्ति, वाहिद का समावेश है। वर्तमान में आरटीओं का एक ड्राइवर के अलावा शैकी, कलसी, कासिफ, भीमा जैसे कई नाम शामिल है। हर दिन 3000 से ज्यादा वाहनों से ओवरलोड एंट्री पर करोड़ों की अवैध वसूली ही रही है।

GPS निकालकर अवैध रेत ढुलाई

सूत्रों के अनुसार, ब्रम्हपुरी तहसील के खरखड़ा फाटा, बामनी और तोरगाव जैसे क्षेत्रों में महोनी से एक तय पैटर्न पर अवैध रेत परिवहन चल रहा है। आरोप है कि रेत घाट पर जाने से पहले वाहनों के जीपीएस उपकरण निकाल लिए जाते हैं और उन्हें एक स्थान पर जमा कर दिया जाता है। इसके बाद वाहन बिना रॉयल्टी रेत भरने चाट में प्रवेश करते हैं।

जीपीएस हटने के कारण सिस्टम में वाहन उसी पुराने स्थान पर खड़ा दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता में वह नदी पात्र से रेत भर रहा होता है। वापसी में फिर वहीं जीपीएस वाधान में लगाकर उसे लाइव कर दिया जाता है।

सैकड़ों वाहन रोजाना अवैध रेत परिवहन कर रहे हैं। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि मॉनिटरिंग एजेंसी वानी शौर्या टेक कंपनी ने आखिर इस तरह की गतिविधियों की रिपोर्ट अधिकारियों को क्यों नहीं दी? यदि दी गई। ती कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

कुर्वे पैटर्न में सेंध : शौर्या की डिजिटल मिलीभगत

महाराष्ट्र सरकार ने रेत चोरी रोकने और गौण खनिज परिवहन को पारदर्शी बनाने के लिए महामाइनिंग प्रणाली लागू की थी, तत्कालीन जिलाधिकारी सचिन कुर्वी ने रेत दोने वाले टिप्परों में जीपीएस सिस्टम अनिवार्य करवावा। शौर्या टेक्नी शीप प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी को तकनीकी मॉनिटरिंग का जिम्मा दिया गया। इस निगरानी के लिए कंथनी को प्रति ब्रास रेत पर 700 रुपये का भुगतान किया जाता है।

ट्रांसपोर्टरी ने स्वयं के खर्च पर हजारों वाहनों में जीपीएस सिस्टम लगवाए और उनका वार्षिक रिचार्ज भी कराया, इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य था कि जैसे ही कोई वाहन निधर्धारित जिओ-फेस रेत घाट क्षेत्र में प्रवेश करें, उसका लाइव लोकेशन रिकॉर्ड ही और उसी आधार पर रॉयल्टी जारी की जाए।

यदि कोई वाहन बिना रॉयल्टी घाट क्षेत्र में आता-जाता है तो उसका अलर्ट सीधे मंडल अधिकारी, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, डीएमओ और जिलाधिकारी तक पहुंचे लेकिन आरोप है कि जमीन पर यह पूरी प्रणाली ध्यास्त नजर आ रही है। शौयों की डिजिटल मिलीभगत से ही सरकार के करोड़ों का राजस्व की चोरी हो रहा है।

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