Caste Equations In Politics:नागपुर मनपा चुनाव (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nagpur Municipal Election: राजनीति में चुनाव लड़ते समय जातीय समीकरणों का विचार अनिवार्य हो जाता है। राजनीतिक आरक्षण देते समय सभी दल इन समीकरणों पर विशेष ध्यान देते हैं और इसी आधार पर मतों का ध्रुवीकरण किया जाता है। भले ही मतदाता पार्टी और उम्मीदवार के कामकाज को प्राथमिकता देते हों, लेकिन मतदान के समय जातीय समीकरण अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
नागपुर महानगरपालिका चुनाव के नतीजों में इस बार यही तस्वीर साफ दिखाई दी। जहां दलित मतों में बिखराव नजर आया, वहीं मुस्लिम मतदाताओं के एकजुट होकर मतदान करने से मनपा की दलीय स्थिति पूरी तरह बदल गई।
पिछले दो दशकों से अपेक्षाकृत एकजुट रहे दलित मतों का ध्रुवीकरण और बिखराव इस चुनाव में भी कायम रहा। रिपब्लिकन पार्टी के विभिन्न गुटों में बंटने के बाद यह वोट बैंक कुछ हद तक कांग्रेस और कुछ हद तक बसपा की ओर झुका। बसपा ने इस वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास भी किया था।
अक्सर देखा गया है कि जहां भाजपा की जीत की संभावना बढ़ती है, वहां दलित मतदाता कांग्रेस की ओर झुक जाते हैं। लेकिन इस बार दलित मतदाताओं ने ‘जीत की क्षमता’ को मतदान का प्रमुख पैमाना माना। भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के रूप में बसपा को देखने वाला यह मतदाता इस बार जीत के करीब दिख रहे कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की ओर मुड़ गया।
विशेष रूप से उत्तर नागपुर में भाजपा को रोकने के उद्देश्य से मतदाताओं ने बसपा के बजाय कांग्रेस को प्राथमिकता दी। हालांकि वार्ड नंबर 6 और वार्ड नंबर 3 में मतदाताओं ने अलग और सोची-समझी रणनीति अपनाई।
वार्ड नंबर 6 में बसपा को वोट देते समय यह ध्यान रखा गया कि भाजपा को लाभ न पहुंचे, इसलिए मुस्लिम लीग के उम्मीदवार को भी समर्थन दिया गया। इसी तरह वार्ड नंबर 3 में एआईएमआईएम के मामले में भी यही स्थिति रही। यहां भाजपा उम्मीदवार कड़ी टक्कर में थे, इसलिए कई दलित मतदाताओं ने एआईएमआईएम के पक्ष में मतदान किया। इस नई राजनीतिक केमिस्ट्री को खुद संबंधित दलों के नेताओं ने भी स्वीकार किया है।
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नागपुर के चुनावी इतिहास में पहली बार मुस्लिम मतदाताओं ने अपनी संगठित शक्ति का प्रभावी प्रदर्शन किया है। जहां भी अवसर मिला, वहां मुस्लिम उम्मीदवारों के पक्ष में एकतरफा मतदान हुआ। वार्ड नंबर 6 और वार्ड नंबर 3 के परिणाम इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। इस बार मुस्लिम उम्मीदवारों को दलित मतदाताओं का भी उल्लेखनीय समर्थन मिला। नागपुर में उभरते इस नए राजनीतिक समीकरण ने बड़े राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है।