नागपुर मनपा चुनाव: फडणवीस-गडकरी के गढ़ में 'विकास' की अग्निपरीक्षा, आज तय होगा ऑरेंज सिटी का भविष्य!

Nagpur Municipal Election: सीएम देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी के गढ़ में विकास की अग्निपरीक्षा। क्या टिकेगा बीजेपी का दबदबा या विकास ठाकरे की रणनीति करेगी कमाल?
Will BJP retain its 109-seat record or will Vikas Thakre’s Congress cause an upset in Fadnavis & Gadkari’s stronghold?
नितिन गडकरी-विकास ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Nagpur Voting Day: ऑरेंज सिटी को अब महाराष्ट्र सीएम सिटी और गडकरी के गढ़ के रूप में जानने लगा है। 2014 के बाद राष्ट्र की तरह राज्य में भी राजनीतिक माहौल ने अचानक 360 डिग्री टर्न लिया और किसी समय कांग्रेस का गढ़ रहे नागपुर में भाजपा ने कब्जा कर लिया। 2014 के बाद हुए लोकसभा में बीजेपी ने जीत हासिल की। विधानसभा चुनाव में बीजेपी-कांग्रेस ने सिटी में 4-2 का स्कोर बनाए रखा।

2017 में अर्थात 8 साल पहले हुए मनपा चुनावों में बीजेपी ने 109 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया था। अब गुरुवार को वोटिंग के बाद शुक्रवार को जब परिणाम सामने आएंगे तो पिक्चर क्लियर होगी कि आखिर वोटरों ने किस पर 'दया' दिखाई। बीजेपी द्वारा किए जा रहे विकास की अग्निपरीक्षा तो होगी ही, साथ ही कांग्रेस पार्टी और कार्यकर्ताओं के एकछत्र नेता विकास ठाकरे की रणनीति का भी स्वरूप नजर आएगा।

BJP : लोकसभा जैसा माहौल, बढ़ी है धड़कन

2014 के बाद के दोनों लोकसभा चुनावों क्रमश: 2019 और 2024 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की लीड में कमी आई थी। 2019 में उन्होंने नाना पटोले के खिलाफ जीत हासिल की थी और 2024 में विकास ठाकरे के खिलाफ भी जीते। मात्र दोनों चुनावों में बीजेपी की देशव्यापी लहर के बाद भी सब कुछ बहुत आसान नहीं रहा।

लोकसभा चुनाव हारने के बाद विधानसभा चुनाव में जब महाराष्ट्र में बीजेपी की सुनामी चल रही थी तब भी पश्चिम नागपुर की सीट बचाने में ठाकरे कामयाब रहे थे। तब नागपुर ने बीजेपी को उत्तर नागपुर की सीट पर भी नितिन राऊत को विजय दिलाकर जोर का झटका दिया था। बहरहाल बीजेपी के पक्ष में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का विकासवादी चेहरा हुकुम का इक्का जैसा ही है।

उनके अर्जुन के रूप में पालक मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले बीते 11 वर्षों से पार्टी-संगठन की धुरा संभाल ही रहे हैं। बीजेपी के लिए सब कुछ बहुत 'फील गुड' जैसा माहौल है, लेकिन पता नहीं क्यों वरिष्ठ नेताओं की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। खुलेआम लोग नहीं कहते लेकिन यह जरूर बुदबुदाते हैं कि 'सब हवा में चल रहा है।'

शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी की अगुवाई में पार्टी ने मराठी-अमराठी विवाद को बहुत ही शानदार तरीके से संतुलित किया है। इसके बाद भी कहा जा रहा है कि बहुत सारे प्रभागों में ऐसे चेहरे दिए गए हैं जिनकी नैया पार कराने में संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं को पसीना छूट रहा है।

कांग्रेस : नए चेहरे, मजबूत एजेंडा पर... एकला चलो

उधर, प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस में हर बार जैसी मायूसी नहीं है। वास्तव में 2014 के बाद नागपुर शहर कांग्रेस मुक्त नहीं हो पाया, जैसा कि बीजेपी ने तैयारी कर रखी थी। इसमें कहा जाता है कि बड़े लेवल पर कई जगह 'कर्ण-अर्जुन' जैसा छिपा हुआ प्यार पनपता है। शहर अध्यक्ष विकास ठाकरे करीब एक दशक से पार्टी का अध्यक्ष पद संभाले हुए हैं और यही कई नेताओं की 'दुखती रग' भी है।

विकास को कोसने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उनकी जगह लेने के लिए हिम्मत दिखाने को कोई तैयार नहीं है। नितिन गडकरी के मुकाबले लोकसभा चुनाव लड़ने को जब आलाकमान ने कहा तो नि:संकोच तैयार हो गए। परिणाम की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने पूरे जिगर से लड़ाई लड़ी। उसका फायदा यह हुआ कि पूरे शहर में उनका अपना नेटवर्क तैयार हो गया।

उस नेटवर्क का लाभ विधानसभा चुनाव में यह हुआ कि नितिन राऊत जैसे मजबूत चेहरे के कारण उत्तर में भी कांग्रेस जीती। लाड़की बहना वाली स्कीम नहीं होती तो बीजेपी समझ रही थी कि उसका क्या हश्र होता। विकास ठाकरे ने इस मनपा चुनाव में कई जगह नए चेहरों को मौका दिया है। ऐसे चेहरे जो जमीन से जुड़े हैं। कई वर्षों से जनता की नि:स्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

टिकट का वितरण इस तरह से हुआ कि कांग्रेस में पहली बार कोई सिर फुटव्वल नजर नहीं आया। कार्यकर्ताओं को इस तरह से एडजस्ट किया गया कि चुनाव लड़ने वालों के पास धन-बल भले ही कम हो, लेकिन मनोबल की कोई कमी नहीं है।

कुछ खटपट हुई जरूर है, लेकिन विकास ठाकरे ने यह सुनिश्चित किया कि विधायक का चुनाव लड़ चुके लोगों के साथ परामर्श कर टिकट बांटी गई। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जो वादा जनता के साथ किया है वह उसके परंपरागत वोट बैंक के साथ-साथ मिडिल क्लास को भी फील गुड का एहसास दिला रहा है।

जनता पूछे एक ही सवाल, कहां थे 8 साल

इस चुनाव प्रचार में जितने भी पूर्व नगरसेवक थे, उनकी जनता ने जमकर 'धुलाई' कर दी। जनता ने सिर्फ एक ही सवाल पूछा कि भाई-ताई, बस इतना बताओ की 8 साल से आप कहां थे। जमीन का नजारा ऐसा है कि कई जगह से पुराने चेहरों को जनता ने रुआंसा बनाकर वापस भेज दिया। प्रचार की हालत देखकर वोटिंग में अलग जुगाड़ के साथ ये लोग लगे हैं।

समस्या यह है कि पिछला चुनाव जीतने के बाद 70 फीसदी नगरसेवक जनता के बीच से गायब हो गए थे। इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो अधिकांश तो कोरोना जैसी महामारी के समय मोबाइल स्विच ऑफ करके बैठ गए थे। 2022 में कार्यकाल खत्म होने के साथ जब चुनाव घोषित नहीं हुए तो अधिकांश ने मोबाइल नंबर ही बदल लिया।

शायद सोच लिया था कि अब उन्हें जनता का सामना करना ही नहीं पड़ेगा। यही कारण है कि इस बार टिकट वितरण में जिस भी पार्टी ने जहां पुराने चेहरे मैदान में उतारे हैं, वहां की ग्राउंड रिपोर्ट देखकर प्रमुख पदाधिकारियों को पसीना छूट रहा है।

  • नवभारत लाइव के लिए संजय तिवारी की रिपोर्ट
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