पूनम टावर केस: हाई कोर्ट में खुली मनपा की पोल! कमिश्नर के नाम और साइन में निकला 'जमीन-आसमान' का अंतर

Poonam Tower Nagpur: पूनम टावर अवैध निर्माण मामले में हाई कोर्ट ने पकड़ी मनपा की चोरी! संजीव जायसवाल का आदेश और हस्ताक्षर सौरभ राव के? दस्तावेजों में गड़बड़ी पर कोर्ट सख्त।
High Court slams NMC over Poonam Tower illegal construction case. Discrepancies found in documents involving former commissioners. Get the latest updates here.
पूनम टावर (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Poonam Tower Nagpur Illegal Construction Case: पूनम टावर में हुए अवैध निर्माण को लेकर विजय बाभरे की ओर से 2 दशक पहले ही हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका पर गत सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने मनपा के अधिकार क्षेत्र में वर्षों से लंबित अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई न किए जाने पर कड़ा रुख अपनाया था। यहां तक कि उन सभी अधिकारियों और पूर्व आयुक्तों को मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया था जो अपने कार्यकाल के दौरान इस अवैध निर्माण को गिराने की जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान प्रतिवादी क्रमांक 7 सहायक आयुक्त द्वारा हाई कोर्ट में हलफनामा दायर कर आवश्यक कार्रवाई नहीं करने की जिम्मेदारी ली गई। दोनों पक्षों की दलीलों के बाद न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने मनपा द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां होने पर कड़ी आपत्ति जताई।

अधीनस्थों पर मढ़ दिया सारा दोष

मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी नंबर 7 सहायक आयुक्त ने हलफनामा दायर कर आवश्यक कार्रवाई न करने की जिम्मेदारी तो ली लेकिन इसका सारा दोष अपने अधीनस्थों पर मढ़ दिया। प्रतिवादी का कहना था कि उसके अधीनस्थों ने तत्कालीन सहायक आयुक्त/वार्ड अधिकारी द्वारा 26 अगस्त 2004 को जारी किए गए नोटिस की जानकारी उसे नहीं दी थी।

अपने बचाव में प्रतिवादी नंबर 7 सहायक आयुक्त ने 13 जून 2012 के एक डेलिगेशन ऑर्डर (अधिकार सौंपने का आदेश) और 1 नवंबर 2012 की राजपत्रित अधिसूचना का हवाला दिया। यह दावा किया गया कि महाराष्ट्र क्षेत्रीय और नगर नियोजन अधिनियम, 1966 (MRTP Act) की धारा 152 के तहत तत्कालीन मनपा आयुक्त ने जोनल सहायक आयुक्तों को एमआरटीपी एक्ट की धारा 53, 54, 55 और 56 के तहत अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अधिकृत किया था।

आदेश और हस्ताक्षर में विसंगति

हालांकि जब अदालत ने इन दस्तावेजों की बारीकी से जांच की तो एक बहुत बड़ी गड़बड़ी सामने आई। अदालत ने पाया कि डेलिगेशन ऑर्डर में शक्तियों का हस्तांतरण तत्कालीन आयुक्त संजीव जायसवाल द्वारा किया गया बताया गया है लेकिन उस आदेश पर हस्ताक्षर एक अन्य आयुक्त सौरभ राव के हैं।

इसके अलावा अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि पेश की गई राजपत्रित अधिसूचना एमआरटीपी एक्ट (MRTP Act) की धारा 152 के तहत जारी ही नहीं की गई थी। इन गंभीर विसंगतियों को देखते हुए प्रतिवादियों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एमजी भांगड़े ने अदालत से मामले में आगे के निर्देश लेने और स्थिति को स्पष्ट करने के लिए समय मांगा।

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