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नागपुर सरकारी अस्पतालों का सच: आधे मरीजों को नहीं मिलती दवाइयां, बाहर से खरीदने को मजबूर
Nagpur Medicine Shortage: नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में दवाइयों की भारी कमी। ओपीडी के 50% मरीजों को दवा नहीं मिलती, जबकि बाकी को अधूरी दवाइयां दी जाती हैं, जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल

नागपुर सरकारी अस्पताल दवाई कमी( सोर्स: सोशल मीडिया )
Nagpur Government Hospital Issue: नागपुर जिले में सरकार दावा करती है कि मेडिकल कॉलेजों सहित अस्पतालों में मरीजों को सभी दवाइयां मिलती हैं। दवाई का भरपूर स्टॉक भी है। हालांकि वास्तविकता सरकार के दावों को झुठलाती है। शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल (मेडिकल) की ही बात करें तो ओपीडी में इलाज के लिए आने वाले 50 फीसदी मरीजों को कोई भी दवाई नहीं मिलती। वहीं किसी भी मरीज को पूरी दवाइयां नहीं मिलतीं।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 20 रुपये के पंजीयन के बाद मरीजों का ओपीडी में इलाज होता है। इलाज के दौरान डॉक्टरों द्वारा मरीजों को दवाइयां लिखकर दी जाती हैं। मरीजों को उम्मीद रहती है कि मेडिकल के औषधालय में दवाइयां मिलेंगी लेकिन औषधालय में कुछ ही दवाइयां मिलती हैं।
इनमें खासतौर पर विटामिन, कैल्सियम, साथ ही मामूली एंटीबायोटिक का समावेश है। एक अध्ययन में सामने आया कि ओपीडी में आने वाले 50 फीसदी से अधिक मरीजों को कोई भी दवाई नहीं मिलती, उन्हें बाहर से महंगे दाम पर दवाइयां खरीदनी पड़ती है।
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डिस्काउंट पर भी ‘अतिक्रमण’
एक अध्ययन में यह सामने आया कि डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाइयों में 30 फीसदी मरीजों को एकमात्र दया निःशुल्क मिलती है, वहीं 10 फीसदी मरीजों को 2-3 दवाइयां मिल पाती है। फीसदी मरीजों को पूरी दवाइया नहीं मिल पाती, मरीजों की सुविधा के लिए मेडिकल परिसर में ही मेडिकल स्टूडेंट कंज्यूमर सोसाइटी का एक मेडिकल स्टोर्स है।
कुछ सरकारी योजना के भी मेडिकल स्टोर्स है, जहां मरीजों की 10 से 30 और कुछ दवाइयों में तो 40 फीसदी तक डिस्काउंट मिलता है, लेकिन इस डिस्काउंट का लाभ पाने चाले भी गिनती के ही है। इसकी मुख्य वजह यह कि डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाइयां डिस्काउंट के दायरे में ही नहीं आती।
सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिये है कि सरकारी अस्पतालों में अधिकाधिक जेनेरिक दवाइयां लिखी जाए। इसके लिए जेनेरिक मेडिकल स्टोर्स भी खोले गये है लेकिन इनमें भी सभी दवाइयां नहीं मिलती क्योंकि डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक की बजाय ब्रांडेड दवाइयां लिखी जाती है।
ब्रांडेड दवाइयां महंगी होती है, साथ ही डिस्काउंट वाले मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध नहीं होती। इस हालत में मरीजों को बाहर से दवाइयां खरीदनी पड़ती है। कई बार 20 रुपये में निःशुल्क जांच कराने पर मरीजों को 2,000 रुपये तक की दवाइया खरीदनी पड़ती है।
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इस और प्रशासन का भी ध्यान नहीं है। उल्टे प्रशासन दाया करता है कि मेडिकल में दवाइयों की कमी नहीं है। एक और जहां विविध तरह के विकास कार्यों के माध्यम से मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है, तो दूसरी और भीतरी तौर पर अब तक व्यवस्था में सुधार नहीं हो सका है।
-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से दिनेश टेकाड़े की रिपोर्ट
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