बाघों की मौत पर कोर्ट नाराज (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Human Error Tiger Conservation: उच्च न्यायालय में एक सनसनीखेज दावा किया गया है कि राज्य में पिछले 12 वर्षों में हुई 298 बाघों की मौतों में से 110 बाघों की मृत्यु मानवीय त्रुटियों के कारण हुई और इन्हें टाला जा सकता था। इस पर गंभीर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने राज्य और केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की पीठ के समक्ष हुई। राज्य में बाघों की वार्षिक मृत्यु दर 4.91 प्रतिशत है जो देश में सबसे अधिक है। इन घटनाओं की फॉरेंसिक जांच बहुत धीमी गति से चल रही है।
2025 में दर्ज 92.9 प्रतिशत मामले अभी भी लंबित हैं, जबकि कुल 143 मामले अनसुलझे हैं। उच्च न्यायालय को यह जानकारी दी गई। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के डेटाबेस और वन विभाग के आंकड़ों में भारी अंतर है। 2021 से 2025 के बीच हुईं 16 बाघों की मौतें आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हैं।
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अब तक शिकार या आकस्मिक बिजली के झटके से 33 बाघों की मौत हो चुकी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बाघ संरक्षण में कुछ कमियां हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुरक्षित बिजली लाइनों के लिए 82 करोड़ रुपये के प्रस्ताव के बावजूद कोई धनराशि प्राप्त नहीं हुई। बाघ संरक्षण के लिए ऐसे सुरक्षा उपायों हेतु 2025-26 के बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया है और नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया गया।