

Nagpur Illegal Mining Land Acquisition: नागपुर निजी भूमि पर बिना अधिग्रहण किए अवैध उत्खनन होने का हवाला देते हुए सुधाकर मट्टे एवं अन्य की ओर से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। याचिका पर बुधवार को सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने बिना उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए खनन किए जाने को गंभीरता से लेते हुए चेतावनी दी है कि यदि बिना पूर्व अधिग्रहण के खनन कार्य सिद्ध होता है तो जिम्मेदार पक्षों को भारी हर्जाना चुकाना पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि यह पाया गया कि विवादित जमीन पर बिना अधिग्रहण के खनन किया गया है तो अदालत नुकसान की भरपाई का आदेश देगी, यह हर्जाना 2013 के अधिनियम के तहत मिलने वाले मूल मुआवजे की राशि के बराबर या उसका दोगुना भी हो सकता है। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि मामले में याचिकाकर्ता संख्या 2 और 5 को पहले ही मुआवजा दिया जा चुका है लेकिन अन्य भूस्वामियों की स्थिति पर विवाद बरकरार है।
में दोनों पक्षों के दावों में भारी विरोधाभास देखने को मिला है। एक ओर सरकार और संबंधित कंपनी का तर्क है कि जहां वास्तविक खनन चल रहा है वह जगह याचिकाकर्ताओं की जमीन से काफी दूर है और उस भूमि पर अभी तक कोई खनन गतिविधि नहीं हो रही है। वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि खनन लगातार उनकी जमीन पर ही हो रहा है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि खनन कंपनी ने खुद इसी जमीन के अधिग्रहण के लिए प्रस्ताव पेश किया था।
अदालत में यह भी बताया गया कि खनन का क्षेत्र बहुत बड़ा है और इसकी सीमाएं लगातार गांव के करीब आ रही हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस गतिविधि का नकारात्मक प्रभाव पूरे गांव पर पड़ रहा है। उन्होंने मांग की कि 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत ऐसी स्थिति में सबसे पहले एक 'सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन' किया जाना अनिवार्य है। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि क्या खनन सीधे याचिकाकर्ता की जमीन पर हो रहा है या फिर आसपास हो रहे खनन की वजह से गांव और जमीन प्रभावित हो रहे हैं।
विरोधाभासी बयानों और भ्रम की स्थिति को देखते हुए अदालत ने सच्चाई का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र 'कमिश्नर' (जांचकर्ता) नियुक्त करने का सुझाव दिया है। यह निष्पक्ष व्यक्ति सीधे मौके पर जाकर स्थिति का मुआयना करेगा और दोनों पक्षों के दावों पर विचार करने के बाद अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपेगा।
याचिकाकर्ताओं ने भी इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि यह उनके हित में होगा क्योंकि इससे वास्तविक स्थिति सबके सामने आ जाएगी। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ताओं को एक विस्तृत नक्शा तैयार करके पेश करने का निर्देश दिया है। इस नक्शे में गांव की सटीक लोकेशन, याचिकाकर्ताओं की जमीन और वह जगह जहां वर्तमान में खनन गतिविधियां चल रही हैं, उसे स्पष्ट रूप से दर्शाना होगा। इस नक्शे के आधार पर ही अदालत यह तय करेगी कि नियुक्त किए जाने वाले कमिश्नर को किस प्रकार का सर्वेक्षण करना है।