विदेशी महिलाओं से देह व्यापार मामले में हाई कोर्ट ने नहीं दी राहत, आरोपी घनशानी की याचिका खारिज

High Court: नागपुर में हाई कोर्ट ने देह व्यापार, मानव तस्करी और धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी मनोज अर्जुन घनशानी की याचिका खारिज कर दी। जानें क्या है पूरा मामला।
High Court: नागपुर में हाई कोर्ट ने देह व्यापार, मानव तस्करी और धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी मनोज अर्जुन घनशानी की याचिका खारिज कर दी। जानें क्या है पूरा मामला।
हाई कोर्ट (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Nagpur News: हाई कोर्ट ने देह व्यापार, मानव तस्करी और धोखाधड़ी के एक सनसनीखेज मामले में आरोपी मनोज अर्जुन घनशानी की याचिका को खारिज कर दिया है। सदर पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग को लेकर घनशानी ने याचिका दायर की थी। अदालत ने प्रथमदृष्टया पर्याप्त सबूतों के आधार पर अस्वीकार कर दिया। यह मामला उज्बेकिस्तान की महिलाओं को देह व्यापार के लिए नागपुर लाने और उन्हें जाली भारतीय पहचान पत्र मुहैया कराने से जुड़ा है।

इस तरह का है पूरा मामला

यह मामला 16 सितंबर 2022 का है जब सदर पुलिस स्टेशन के सहायक पुलिस निरीक्षक संतोष पांडुरंग जाधव को गुप्त सूचना मिली। सूचना के अनुसार सदर स्थित बड़े होटल में विदेशी नागरिकों को वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से लाया गया था। पुलिस टीम ने जब होटल पर छापा मारा तो वहां उज्बेकिस्तान की 2 महिलाएं मिलीं। तलाशी के दौरान उनके पास से मिले आधार कार्ड और चुनाव पहचान पत्र जांच में जाली पाए गए। जांच और पूछताछ के दौरान महिलाओं ने पुलिस को दिए अपने बयानों में खुलासा किया कि व्यवसायी मनोज घनशानी ने ही उन्हें यह जाली आधार और चुनाव कार्ड मुहैया कराए थे।

कई सनसनीखेज खुलासे

  • घनशानी ने ‘मेक-माई-ट्रिप’ एप का उपयोग करके महिलाओं के लिए टिकट बुक किए थे और होटल में उनके रहने की व्यवस्था की थी।
  • आरोपी के जब्त किए गए मोबाइल फोन में कई ग्राहकों, महिलाओं और लड़कियों के नंबर मिले।
  • वह ग्राहकों से कमीशन लेता था और गूगल-पे, फोन-पे जैसे मोबाइल बैंकिंग एप के जरिए विदेशी महिलाओं को भुगतान करता था।
  • जांच में यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी विदेशी नागरिकों को भारत लाकर उन्हें जाली पहचान पत्र देकर यौन व्यापार में शामिल कर वेश्यावृत्ति करवा रहा था।

तस्करी का सीधा सबूत नहीं

सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कहा कि घनशानी के खिलाफ तस्करी या जालसाजी का कोई सीधा सबूत नहीं है। वहीं सरकारी वकील ने जांच में मिले सबूतों का हवाला देते हुए याचिका का कड़ा विरोध किया। दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने अपने फैसले में कहा कि प्रथमदृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मानव तस्करी (निवारण) अधिनियम की धारा 370 के तहत यह एक गंभीर अपराध है जिसमें पीड़िता की सहमति भी मायने नहीं रखती। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने FIR को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।

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