कोराडी पावर प्लांट (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Koradi Power Plant Tender Dispute: ‘वैगन ट्रिप्लर ड्राइव’ के लिए हाईड्रोलिक पंपों की डिजाइन और निर्माण के अनुभव को पूरा नहीं करने के बावजूद कंपनी को योग्य करार दिए जाने तथा महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (महाजेनको) द्वारा हाईड्रोलिक पंपों की खरीद के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देते हुए एमएस एंटरप्राइजेज ने याचिका दायर की।
इस पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल किल्लोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने टेंडर प्रक्रिया में प्रतिवादी को पात्र घोषित करने में कोई त्रुटि नहीं होने का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता की अधि। आरएस सिरपुरकर ने पैरवी की।
‘वैगन ट्रिप्लर ड्राइव’ के लिए हाईड्रोलिक पंपों की खरीद के लिए जारी निविदा में याचिकाकर्ता एमएस एंटरप्राइजेज ‘L2’ (दूसरी सबसे कम बोली लगाने वाला) था, जबकि प्रतिवादी संख्या 2 को ‘L1’ (सबसे कम बोली लगाने वाला) घोषित किया गया था। याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी संख्या 2 की पात्रता को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वह टेंडर की अनिवार्य शर्तों, विशेष रूप से डिजाइन और निर्माण के अनुभव को पूरा नहीं करता है।
याचिकाकर्ता के वकील आरएस सिरपुरकर ने तर्क दिया कि टेंडर की धारा V के तहत निर्धारित प्रारूप में जानकारी देना अनिवार्य था लेकिन प्रतिवादी संख्या 2 ने खुद को निर्माता बताते हुए तकनीकी विशिष्टताओं में लागू नहींलिखा था जो कि नियमों का उल्लंघन है।
दूसरी ओर महाजेनको के वकील एडी मोहगांवकर ने कहा कि प्रतिवादी संख्या 2 के पास नेशनल स्मॉल इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा जारी प्रमाणपत्र है जो उसे हाईड्रोलिक पंपों के निर्माता के रूप में प्रमाणित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उसे पंपों का निर्माता न भी माना जाए तो भी वह हाईड्रोलिक मोटर बनाता है जिसे समान उपकरण माना जा सकता है।
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दोनों पक्षों की दलीलों के बाद हाई कोर्ट ने आदेश में स्पष्ट किया कि वह तकनीकी मामलों में विशेषज्ञ नहीं है कि यह तय करे कि हाईड्रोलिक पंप और मोटर एक समान है या नहीं। हालांकि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और महाजेनको द्वारा दिए गए हलफनामे के आधार पर अदालत ने प्रतिवादी संख्या 2 को पात्र माना।
दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने यह भी पाया कि स्वयं याचिकाकर्ता (एमएस एंटरप्राइजेज) भी निर्माता नहीं है बल्कि केवल एक आपूर्तिकर्ता है, इसलिए वह भी टेंडर की क्लॉज 2.1(a) की शर्तों को पूरी तरह पूरा नहीं करता है। इन तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।