शेयर बाजार में मुनाफे का लालच पड़ा भारी, नागपुर हाई कोर्ट पहुंचा 19 लाख का विवाद; याचिका खारिज

Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने 19.65 लाख रुपये की वसूली मामले में पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि कोविड अवधि के नियमों के तहत मुकदमा समयसीमा में दायर हुआ।
Greed for Profits in Stock Market Proves Costly: ₹19 Lakh Dispute Reaches Nagpur High Court; Petition Dismissed
नागपुर हाई कोर्ट, (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur High Court Recovery Case: नागपुर हाई कोर्ट ने 19.65 लाख रुपये की वसूली से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में प्रतिवादियों की पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन एप्लीकेशन) को खारिज कर दिया। न्यायाधीश रोहित जोशी ने स्पष्ट किया कि कोविड-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा बढ़ाई गई परिसीमा अवधि के नियमों के तहत वादी द्वारा दायर किया गया मुकदमा समय सीमा के भीतर है।

याचिकाकर्ता हर्षद भंडारकर और प्रतिवादी बाबासाहेब मांजरे व अन्य के शेयर बाजार में निवेश को लेकर विवाद है। याचिकाकर्ता के अनुसार उसने 16 अप्रैल 2018 से 2 फरवरी 2019 के बीच प्रतिवादियों को 19,65,000 रुपये दिए थे। प्रतिवादियों ने उसे शेयर बाजार में निवेश कर प्रति माह 10% के भारी मुनाफे का लालच दिया था।

राशि लौटाने से कर दिया इनकार

याचिकाकर्ता का आरोप है कि जब उसने मुनाफे के साथ अपनी रकम वापस मांगी, तो प्रतिवादियों ने मार्च 2019 तक पैसे लौटाने का वादा किया, लेकिन उसके बाद उन्होंने उससे संपर्क तोड़ दिया। खुद को ठगा हुआ महसूस कर याचिकाकर्ता ने 24 अक्टूबर 2019 को गणेशपेठ पुलिस स्टेशन में प्रतिवादियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।

इसके बाद वादी ने 28 जुलाई 2023 को सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 37 के तहत वसूली के लिए 'समरी सूट' दायर किया। निचली अदालत ने पाया कि यह मामला 'समरी सूट' की शतों को पूरा नहीं करता, इसलिए इसे एक सामान्य दीवानी मुकदमे के रूप में चलाने का आदेश दिया।

इसके खिलाफ प्रतिवादियों ने निचली अदालत में याचिका खारिज करने की मांग की, यह तर्क देते हुए कि मामला परिसीमा अवधि के बाहर है। निचली अदालत द्वारा यह मांग ठुकराए जाने के बाद प्रतिवादियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट में प्रतिवादियों के वकील ने मुख्य रूप से 'लिमिटेशन' का मुद्दा उठाया।

उनका तर्क था कि चूंकि आखिरी जमा राशि 2 फरवरी 2019 को दी गई थी, इसलिए 3 साल की सामान्य परिसीमा अवधि 1 फरवरी 2022 को समाप्त हो चुकी थी। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोविड-19 के कारण दी गई छूट के बावजूद यह मुकदमा जुलाई 2023 में दायर होने के कारण समय-बाधित है।

प्रतिवादियों की पुनरीक्षण याचिका खारिज

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 15 मार्च 2020 से 28 फरवरी 2022 तक की पूरी अवधि को गणना से बाहर रखा जाना चाहिए, जिससे मुकदमा तय समय के भीतर माना जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वाद पत्र के आधार पर 'वाद कारण' मार्च 2019 में शुरू हुआ माना जाएगा क्योंकि उस समय प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता से संपर्क काटा था।

इस आधार पर मुकदमा दायर करने की सामान्य समय सीमा मार्च 2022 में खत्म होती, जो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई कोविड-19 अवधि (28 फरवरी 2022) के बाद आती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 15 मार्च 2020 को बची हुई परिसीमा अवधि अब 1 मार्च 2022 से फिर से शुरू मानी जाएगी। इस गणित के अनुसार, 20 जुलाई 2023 को दायर किया गया यह मुकदमा प्रारंभिक तौर पर परिसीमा के भीतर है। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने प्रतिवादियों की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

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