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लैब से लेक्चर तक…नए मेडिकल कॉलेजों का बुनियादी ढांचा कमजोर, FAIMA सर्वे में खुलासा, खतरे में भविष्य!
Federation of All India Medical Associations Report: FAIMA सर्वे में भारत के नए मेडिकल कॉलेजों में कमजोर बुनियादी ढांचा शिक्षकों की कमी और प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है।
- Written By: प्रिया जैस

मेडिकल कॉलेजों की हालत खस्ता (AI Generated Photo)
Medical Colleges: फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) ने पूरे भारत में किए गए रिव्यू मेडिकल सिस्टम सर्वेक्षण के परिणाम जारी किए हैं। यह सर्वेक्षण देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में किया गया और इसमें 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,000 से अधिक छात्रों, शिक्षकों और प्रोफेसर शामिल हुए।
सर्वेक्षण से पता चला कि कई नए खुले वैद्यकीय संस्थाओं में बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की उपलब्धता और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में गंभीर खामियां और कमियां हैं। सर्वेक्षण में मेडिकल, मेयो, एम्स सहित महाराष्ट्र के 600 से अधिक डॉक्टरों ने हिस्सा लिया। एम्स, पीजीआई, जेआईपीएमईआर जैसे प्रमुख संस्थानों के शिक्षकों और छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
अंदमान और निकोबार के डॉक्टर भी शामिल
उल्लेखनीय रूप से अंदमान और निकोबार द्वीप समूह के डॉक्टरों ने भी सर्वेक्षण में भाग लिया। सभी प्रतिभागियों में से 90.4 फीसदी सरकारी संस्थानों से और 7.8 फीसदी निजी संस्थानों से थे, जो देश भर में चिकित्सा शिक्षा प्रणाली का एक संतुलित और प्रतिनिधि दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। 69.2 फीसदी छात्रों ने कहा कि प्रयोगशालाओं और उपकरणों की सुविधाएं संतोषजनक हैं जबकि शिक्षकों की उपलब्धता केवल 68.8 फीसदी ही पायी गई।
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केवल 44.1 फीसदी कॉलेजों में ही सक्रिय कौशल प्रयोगशालाएं है। केवल आधे प्रतिभागियों को समय पर विद्या वेतन मिला और 29.5 फीसदी छात्रों के काम के घंटे निश्चित पाये गये। 73.9 फीसदी छात्रों ने कहा कि लिपिकीय कार्य का भारी बोझ है। 55.2 फीसदी ने कर्मचारियों की कमी बताई जबकि 40.8 फीसदी छात्रों ने कहा कि कार्यस्थल का वातावरण विषाक्त (टॉक्सिक) है। वहीं 89.4 फीसदी प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि खराब बुनियादी ढांचा शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करता है।
मेडिकल कॉलेजों में कमियां
प्रयोगशालाएं – 44.1 प्रश कॉलेजों में ही मौजूद
काम के घंटे – 29.5 प्रश छात्रों के ही निश्चित
लिपिकीय काम – 73.9 प्रश छात्रों पर भारी बोझ
कर्मियों की कमी – 55.2 फीसदी तक बनी हुई
तत्काल हस्तक्षेप और सुधारों की मांग
शासकीय संस्थाओं की तुलना में निजी कॉलेजों में शिक्षा की नियमितता और शिक्षकों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर पायी गई। 70.4 फीसदी छात्रों ने कौशल हासिल करने में विश्वास व्यक्त किया लेकिन 57.4 फीसदी छात्रों ने कहा कि वे स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के लिए तैयार हैं। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
इन निष्कर्षों के आधार पर संगठन ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से तत्काल हस्तक्षेप और सुधारों की मांग की है। चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अच्छा बुनियादी ढांचा, पर्याप्त कर्मचारी, लिपिकीय बोझ में कमी, समय पर विद्या वेतन का भुगतान और प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में अनिवार्य कौशल प्रयोगशालाओं की स्थापना आवश्यक है।
सुझावों को किया नजरअंदाज
संगठन ने संबंधित अधिकारियों को औपचारिक रूप से रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। संगठन का मानना है कि भारत में बढ़ती चिकित्सा शिक्षा प्रणाली विश्व स्तरीय गुणवत्तापूर्ण, कुशल और आत्मविश्वासी डॉक्टर तैयार करने के लिए समय की आवश्यकता है। सर्वेक्षण के बाद संगठन द्वारा नेशनल मेडिकल कमीशन के अधिकारियों से मिलने की पहल की लेकिन उनके सुझावों को नजरअंदाज कर दिया गया।
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यह सर्वेक्षण संगठन के संरक्षक डॉ. रोहन कृष्णन, डॉ. संदीप डागर, अध्यक्ष डॉ. मनीष जांगड़ा और अध्यक्ष डॉ. अक्षय डोंगरदीव के मार्गदर्शन में किया गया। इस सर्वेक्षण के मुख्य आयोजक डॉ. सजल बंसल थे। सह-अध्यक्ष डॉ. जयदीप चौधरी, डॉ. श्रीनाथ, डॉ. सुशील शिंदे के साथ-साथ देश भर के सभी रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशनों के पदाधिकारियों ने सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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