MVA में दरार: शरद पवार की राज्यसभा एंट्री पर उद्धव गुट नाराज, कांग्रेस के हस्तक्षेप से बनी बात
Sharad Pawar Rajya Sabha Election: महाराष्ट्र में राज्यसभा चुनाव के दौरान शरद पवार की उम्मीदवारी पर शिवसेना (UBT) और कांग्रेस के बीच मतभेद खुलकर सामने आए। जानें क्यों नाराज हैं उद्धव ठाकरे।
- Written By: अनिल सिंह
MVA Internal Conflict Uddhav Thackeray Sharad Pawar (फोटो क्रेडिट-X)
MVA Internal Conflict Uddhav Thackeray: महाराष्ट्र की राजनीति में महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर दरारें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। राज्यसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (SP) के दिग्गज नेता शरद पवार की उच्च सदन में एंट्री ने गठबंधन के अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। शिवसेना (UBT) और कांग्रेस के बीच शरद पवार की उम्मीदवारी को लेकर कड़ा गतिरोध देखने को मिला। शिवसेना (UBT) नेतृत्व का मानना है कि एनसीपी (शरद पवार) अब एक भरोसेमंद साथी नहीं रही है, क्योंकि पर्दे के पीछे उनके भाजपा नीत एनडीए (NDA) गठबंधन के साथ विलय की खबरें लगातार गर्म थीं। इसी अविश्वास के कारण ठाकरे गुट ने शुरू में पवार के समर्थन से इनकार कर दिया था।
गठबंधन के भीतर तनाव तब और बढ़ गया जब सुप्रिया सुले और जयंत पाटिल ने उद्धव ठाकरे से दो घंटे तक लंबी मुलाकात की, लेकिन वे उन्हें शरद पवार के नाम पर राजी नहीं कर पाए। उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि वे पवार का सम्मान करते हैं, लेकिन इस बार शिवसेना अपना उम्मीदवार राज्यसभा भेजना चाहती थी। हालांकि, अंततः दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप और पवार के पक्ष में समर्थन के ऐलान ने शिवसेना (UBT) को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया और उन्हें अनिच्छा से इस फैसले को स्वीकार करना पड़ा।
गठबंधन में अविश्वास और मर्जर की खबरें
शिवसेना (UBT) की नाराजगी का मुख्य कारण एनसीपी (SP) की भाजपा के साथ बढ़ती कथित नजदीकियां हैं। ठाकरे गुट के नेताओं का आरोप है कि शरद पवार गुट अपनी पार्टी का मूल एनसीपी के साथ विलय करने और एनडीए का हिस्सा बनने की योजना बना रहा था। उद्धव सेना के एक वरिष्ठ नेता ने खुलासा किया कि आदित्य ठाकरे ने स्पष्ट कर दिया था कि केवल शिवसेना (UBT) और कांग्रेस ही मजबूती से भाजपा का विरोध कर रहे हैं। गठबंधन के भीतर यह भावना प्रबल है कि जो पार्टियां सत्ता के लिए गुप्त बैठकें करती हैं, उनका ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में स्वागत नहीं होना चाहिए।
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दिल्ली से कांग्रेस का हस्तक्षेप और पवार की जीत
जब मातोश्री से बात नहीं बनी, तो सुप्रिया सुले ने नई दिल्ली का रुख किया और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित वरिष्ठ नेताओं को मनाने की कोशिश शुरू की। कांग्रेस नेतृत्व भी शुरुआत में मर्जर की खबरों से नाखुश था और अपनी सीट का दावा पेश कर रहा था, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में शरद पवार के कद को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें नाराज न करने का फैसला लिया। कांग्रेस द्वारा शरद पवार की उम्मीदवारी के समर्थन के आधिकारिक ऐलान ने शिवसेना (UBT) को धर्मसंकट में डाल दिया। अकेले दम पर अपना उम्मीदवार जिताने की संख्या न होने के कारण उद्धव ठाकरे को पीछे हटना पड़ा।
ठाकरे परिवार की नाराजगी और भविष्य की चुनौती
शरद पवार की जीत के बावजूद ठाकरे परिवार में इस पूरी प्रक्रिया को लेकर गहरा गुस्सा है। आदित्य ठाकरे ने नामांकन का मुद्दा सुलझने के बाद अपनी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि वे अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन अब उन्हें 2028 तक अपना उम्मीदवार राज्यसभा भेजने का मौका नहीं मिलेगा। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि आगामी चुनावों से पहले एमवीए के भीतर ‘ऑल इज वेल’ नहीं है। सीट बंटवारे और भविष्य की रणनीतियों को लेकर अविश्वास की यह खाई गठबंधन की स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
