
मंत्री मंगल प्रताप लोढ़ा व मुंबई का KEM अस्पताल (सोर्स: सोशल मीडिया)
KEM Hospital Renaming: मुंबई के प्रतिष्ठित किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल के नाम को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। महाराष्ट्र के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने अस्पताल के 100 साल पूरे होने के अवसर पर इसके नाम से ब्रिटिश पहचान हटाकर भारतीय पहचान को अपनाने का औपचारिक प्रस्ताव पेश किया है।
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने गुरुवार, 22 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखते हुए केईएम अस्पताल के नाम में बदलाव की मांग की। कौशल विकास और उद्यमिता विभाग संभालने वाले और मुंबई उपनगर जिले के संरक्षक मंत्री लोढ़ा ने स्पष्ट किया कि ‘एडवर्ड’ नाम एक ब्रिटिश पहचान है जो औपनिवेशिक गुलामी का प्रतीक है। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान युग राष्ट्रीय पहचान को फिर से स्थापित करने का है और हमारे सार्वजनिक संस्थानों के नाम में भारतीयता और राष्ट्रीय अस्मिता झलकनी चाहिए। उनके अनुसार, यह नाम भारतीय पहचान को प्रतिबिंबित नहीं करता है।
यह प्रस्ताव एक ऐतिहासिक मोड़ पर आया है, क्योंकि KEM अस्पताल वर्तमान में अपना शताब्दी वर्ष (Centenary Year) मना रहा है। 1926 में अपनी स्थापना के बाद से, यह अस्पताल मुंबई के स्वास्थ्य ढांचे का एक आधार स्तंभ रहा है। पिछले 100 वर्षों में यह संस्थान एक औपनिवेशिक युग की सुविधा से विकसित होकर भारत के प्रमुख सार्वजनिक चिकित्सा केंद्रों में से एक बन गया है। अस्पताल के साथ जुड़ा सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज भी लाखों नागरिकों, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए जाना जाता है।
मंत्री मंगल प्रताप लोढ़ा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हालांकि उन्होंने इस विचार को प्रस्तावित किया है, लेकिन इस पर आधिकारिक मुहर लगाने का अधिकार स्थानीय प्रशासन के पास है। उन्होंने कहा कि नाम बदलने की आधिकारिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) द्वारा लिया जाएगा। इस सुझाव ने मुंबई में औपनिवेशिक युग के नामकरण को लेकर चल रही चर्चा को एक बार फिर से गरमा दिया है।
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पिछले एक दशक में, केईएम अस्पताल ने देश के चिकित्सा जगत में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां और मील के पत्थर हासिल किए हैं। यह संस्थान न केवल गंभीर बीमारियों के इलाज का केंद्र रहा है, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी रहा है। शताब्दी वर्ष के इस महत्वपूर्ण अवसर पर नाम बदलने का यह प्रस्ताव न केवल प्रशासनिक बदलाव है, बल्कि इसे एक प्रतीकात्मक वैचारिक बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें बीएमसी के निर्णय पर टिकी हैं कि क्या इस ऐतिहासिक संस्थान को एक नया भारतीय नाम मिलेगा।






