उद्धव ठाकरे (सोर्स: सोशल मीडिया)
Devendra Fadnavis Statement Controversy: महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों संवैधानिक गरिमा और अधिकारों की व्याख्या को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद के केंद्र में है ‘ब्रह्मवाक्य’, जिसे लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) आमने-सामने आ गए हैं। हाल ही में विधान परिषद में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने न केवल सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तल्खी बढ़ा दी है, बल्कि राज्य के पिछले कुछ बड़े संवैधानिक फैसलों पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत सातारा में भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच हुई एक झड़प से हुई। यह संघर्ष जिला परिषद अध्यक्ष पद को लेकर हुआ था, जहां पुलिस पर भाजपा का पक्ष लेने के आरोप लगे। इस घटना के दौरान मंत्री शंभूराज देसाई और पुलिस प्रशासन के बीच तीखी बहस भी हुई थी। इसके जवाब में शिंदे गुट की नेता और विधान परिषद की उपाध्यक्ष नीलम गोरहे ने कड़ा रुख अपनाते हुए सातारा के पुलिस अधीक्षक (SP) तुषार दोषी को निलंबित करने का निर्देश दे दिया।
हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस निलंबन को लागू करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अंतिम निर्णय लेने की शक्ति कार्यपालिका के पास होती है। फडणवीस ने विधान परिषद में स्पष्ट रूप से कहा कि स्पीकर या चेयरपर्सन द्वारा दिए गए निर्देश ‘अंतिम’ या ‘ब्रह्मवाक्य’ नहीं होते हैं। उनके अनुसार, सदन के अध्यक्ष के निर्देश सर्वोपरि नहीं हैं और सरकार उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं है।
उद्धव ठाकरे गुट ने मुख्यमंत्री के इस रुख को ‘राजनीतिक सुविधा’ करार दिया है। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना‘ के संपादकीय में फडणवीस पर निशाना साधते हुए कहा गया कि यदि आज अध्यक्ष के निर्देश ‘ब्रह्मवाक्य’ नहीं हैं, तो 10 जनवरी 2024 को लिए गए फैसले को ‘ऐतिहासिक’ और ‘अंतिम’ क्यों बताया गया था?
बता दें कि 10 जनवरी को विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने उद्धव ठाकरे गुट द्वारा दायर अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया था और एकनाथ शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना’ के रूप में मान्यता दी थी। सामना ने याद दिलाया कि उस समय फडणवीस और शिंदे गुट ने उस फैसले को ‘ब्रह्मवाक्य’ के रूप में स्वीकार किया था और इसे सत्य की ‘कानूनी जीत’ बताया था। यूबीटी का तर्क है कि यदि आज मुख्यमंत्री ईमानदार हैं, तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि 10 जनवरी के फैसले की भी समीक्षा की जा सकती है, क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी निर्णय आलोचना से परे नहीं होता।
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संपादकीय में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या पद का निर्णय सर्वोपरि नहीं हो सकता। एकमात्र सच्चा ‘ब्रह्मवाक्य’ भारत का संविधान है। उद्धव गुट ने मांग की है कि यदि मुख्यमंत्री अपने बयान पर कायम हैं, तो उन्हें तुरंत घोषित करना चाहिए कि विधायक अयोग्यता मामले में राहुल नार्वेकर का निर्णय भी अंतिम नहीं था और वह न्यायिक समीक्षा के अधीन है। यह ‘दोहरा मापदंड’ राज्य की राजनीति में एक नई कानूनी और संवैधानिक बहस को जन्म दे रहा है।