IAS Tukaram Mundhe: 21 साल की सर्विस में 24 बार तबादला! आखिर क्यों बार-बार होता है तुकाराम मुंढे का ट्रांसफर?

IAS Tukaram Mundhe News: महाराष्ट्र के सबसे चर्चित IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे के बार-बार होने वाले तबादलों के पीछे की असली कहानी। जानिए क्यों उनकी ईमानदारी और कार्यशैली राजनेताओं को रास नहीं आती।
IAS Tukaram Mundhe Tansfers Reason
IAS तुकाराम मुंढे (सोर्स: सोशल मीडिया)
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IAS Tukaram Mundhe Tansfers Reason: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में कुछ अधिकारी अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं, तो कुछ अपने सख्त अनुशासन के लिए। लेकिन महाराष्ट्र कैडर के IAS तुकाराम मुंढे एक ऐसा नाम हैं, जिनकी चर्चा उनकी कार्यशैली से ज्यादा उनके तबादलों के लिए होती है। 21 साल के करियर में उनका 24 बार तबादला हो चुका है। औसतन हर 10-11 महीने में उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ता है। आखिर ऐसा क्या है कि कोई भी सरकार उन्हें एक जगह टिकने नहीं देती?

हाल ही में महाराष्ट्र के 10 आईएएस अधिकारियों को तबादला हुआ है। इसमें तुकाराम मुंढे का भी नाम शामिल है। उन्हें दिव्यांग कल्याण विभाग के सचिव पद से हटाक आपदा प्रबंधन, राजस्व एवं वन विभाग सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है।

फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र के खिलाफ चलाया अभियान

दिव्यांग कल्याण विभाग का सचिव रहते उन्होंने एक व्यापक सत्यापन अभियान शुरू किया गया था। मुंढे ने जिला परिषदों में दिव्यांग कर्मचारियों के प्रमाण पत्रों का सत्यापन करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। राज्य भर में कई लोग फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी नौकरियों और योजनाओं का लाभ उठा रहे थे। इस पर अंकुश लगाने के लिए इस अभियान को चलाया गया। इस अभियान के दौरान कई कर्मचारियों को निलंबित भी किया गया। जिसकी पूरे राज्य में चर्चा हुई।

क्या है तबादले के कारण?

मुंढे के बार-बार होने वाले ट्रांसफर के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों की लंबी फेहरिस्त है।

नेताओं से सीधा टकराव: तुकाराम मुंढे कभी भी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकते। 'नियम ही सर्वोपरि है' की उनकी नीति अक्सर स्थानीय विधायकों और मंत्रियों के हितों से टकराती है।

भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक: चाहे सोलापुर हो या जालना, उन्होंने रेत माफिया और अवैध शराब के धंधों की कमर तोड़ दी थी। इन अवैध धंधों को अक्सर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है, जिसके चलते उनकी विदाई तय कर दी जाती है।

कठोर कार्यशैली: वे केवल भ्रष्ट सिस्टम ही नहीं, बल्कि कामचोर कर्मचारियों पर भी सख्त रहते हैं। पुणे (PMPML) और नागपुर में उन्होंने लापरवाह कर्मचारियों और ठेकेदारों पर सीधी कार्रवाई की, जिससे कर्मचारी संगठनों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

लोकप्रियता का दबाव: जब मुंढे किसी शहर में जाते हैं, तो वे आम जनता के 'हीरो' बन जाते हैं। उन्हें 'महाराष्ट्र का अशोक खेमका' या 'सिंघम' कहा जाता है। जनता का यह भारी समर्थन अक्सर नेताओं के लिए असुरक्षा का कारण बन जाता है।

प्रशासकीय संघर्ष के बड़े उदाहरण

नवी मुंबई नगर निगम (NMMC) के आयुक्त रहते हुए तुकाराम जो अनुशासन दिखाया, उससे चिढ़कर सभी दलों के पार्षदों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक पारित कर दिया था। ऐसा कम ही देखा जाता है कि एक अफसर को हटाने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष एक हो जाएं।

तुकाराम मुंढे का मानना है कि प्रशासन जनता के लिए है, किसी खास समूह के लिए नहीं। इसी बेधड़क स्वभाव और पारदर्शिता के कारण वे सिस्टम के लिए 'मिसफिट' साबित होते रहे हैं। हालांकि, उनकी हर बदली के बाद जनता सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराती है, जो उनकी साख का प्रमाण है।

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