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Mumbai: पांजू टापू के लोगों की जिंदगी ‘मौत की पटरी’ पर, पुल निर्माण अटका टेंडर में
Mira-Bhyandar के पास समुद्र में बसे पांजू टापू के 3,500 ग्रामीण रोज रेलवे पटरी पर जान जोखिम में डालकर सफर करते हैं।पुल परियोजना टेंडर में फंसी है और अब तक कई लोग इस "मौत के रास्ते" पर मारे जा चुके है।
- Written By: अपूर्वा नायक

पांजु टापू (सौ. सोशल मीडिया )
Mumbai News In Hindi: भाईंदर और नायगांव के बीच समुद्र में बसा छोटा-सा पांजू टापू तक पहुंचने के लिए न कोई सड़क है न कोई पुल, केवल पानी और रेल की पटरी ही गांव को दुनिया से जोड़ते हैं, लेकिन यही रास्ता आज वहां के लोगों के लिए मौत का पुल बन चुका है।
भाईंदर और नायगांव के बीच इस टापू की आबादी 3500 से अधिक है। मीरा-भाईंदर से नायगांव मेट्रो और परिवहन पुल परियोजना के टेंडर में देरी ने पांजू टापू के ग्रामीणों का बरसों पुराना पुल का सपना चकनाचूर कर दिया है। प्रति दिन पांजू के लगभग 3,500 लोग जीवन का जोखिम उठाकर रेलवे पुल की पटरियों पर पैदल चलते हैं।
नीचे समुद्र की लहरें टकराती हैं, ऊपर से तेज रफ्तार ट्रेनें गुजरती हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अब तक 5 से 6 लोगों की मौतें इसी पुल पर हो चुकी हैं। हाल ही में गांव के 25 वर्षीय संजय भोईर की मौत ने फिर से इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है। संजय पुल पर टहल रहा था, तभी चलती लोकल से एक यात्री ने बैग फेंक दिया। जिसकी चोट से संजय की मौके पर ही मौत हुई थी।
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रो-रो सेवा के लाभ से भी वंचित
भाईंदर से वसई किले तक शुरू हुए रो-रो सेवा का लाभ भी पांजू टापू के ग्रामीणों को नहीं मिलता है। भाईंदर जेट्टी से वसई किले तक जाने के रास्ते में पांजू गांव दाहिने तरफ छूट जाता है। गांव के पूर्व सरपंच विलास भोईर ने बताया कि पाजू गांव में भी जेट्टी का निर्माण किया गया है, लेकिन रो-रो सेवा से भी ग्रामीण अब तक बंचित हैं।
नाव या पटरी, बस यही दो रास्ते
पाजू गांव तक पहुंचने का एकमात्र सुरक्षित साधन नाव है गांव से भाईंदर या नायगाव स्टेशन पहुंचने के लिए 4-5 मिनट की नाव यात्रा करनी पड़ती है, लेकिन नाव सेवा सीमित है और कई बार खराब मौसम या ज्वार-भाटा के दौरान यह सेवा ठप पड़ जाती है, ऐसे में ग्रामीणों के पास रेलवे पुल की पटरी पर पैदल चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह सफर आधे घंटे तक चलता है, जिसमें हर कदम मौत से मुकाबला होता है।
लाल फीताशाही में फंसी परियोजना
मीरा-भाईंदर से नायगाव मेट्रो रेल और सड़क पुल परियोजना, कभी इस इलाके के लिए उम्मीद की किरण बनी थी, योजना के मुताबिक यह पुल बांजू गांव से होकर गुजरने वाला था, जिससे गांव सीधा शहर से जुड़ जाता, लेकिन परियोजना लाल फीताशाही में फंस गई।
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जब विकास की राहें अधूरी रह जाएं
पांजू टापू की यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता की दास्तान है, जहां शहरों में मेट्रो और तटीय सड़कों की चमक है, वहीं कुछ ही किलोमीटर दूर लोग जीवित रहने के लिए जान दांव पर लगा रहे हैं। जब तक यह पुल नहीं बनेगा, पांजू के ग्रामीण हर दिन मौत की पटरी पर चलने को मजबूर रहेंगे, क्योंकि उनके लिए अब तक विकास का रास्ता सिर्फ टेंडर में देरी” का शिकार है। सरकारों की अनदेखी से गहराता गुस्सा स्थानीय लोगों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें दोनों इस समस्या को नजरअंदाज कर रही हैं। गांव वालों ने कई बार प्रशासन से पुल बनाने की मांग की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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