'मालेगांव ब्लास्ट की सच्चाई तक पहुंचना नामुमकिन...', बाॅम्बे हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्यों कही ये बात

Malegaon Blast Case: बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 मालेगांव धमाकों के 4 आरोपियों को बरी करते हुए NIA की जांच पर कड़े सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि सच्चाई अब एक अनसुलझा रहस्य बन गई है।
Bombay High Court stated reaching truth in Malegaon blast case appears difficult
मालेगांव ब्लास्ट (डिजाइन फोटो)
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Bombay High Court On Malegaon Blast Case: साल 2006 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव को दहला देने वाले बम विस्फोटों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का एक बड़ा फैसला सामने आया है। अदालत ने मामले के चार प्रमुख आरोपियों राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवरिया और लोकेश शर्मा को सभी आरोपों से मुक्त (बरी) कर दिया है। लेकिन इस फैसले के साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की कार्यशैली पर जो तीखी टिप्पणी की है, उसने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

NIA की चुनिंदा जांच पर कोर्ट की नाराजगी

बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि NIA ने पिछली जांच एजेंसी (ATS) द्वारा जुटाए गए महत्वपूर्ण सबूतों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। अदालत ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि जांच अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है जहां 31 लोगों की जान लेने वाले इस भयावह अपराध की सच्चाई तक पहुंचना लगभग नामुमकिन लग रहा है। अदालत ने कहा कि यह एक रहस्य है कि NIA ने नए साक्ष्य एकत्र करने के बजाय केवल उन कबूलनामों पर भरोसा किया जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया था। एटीएस और एनआईए के आरोपपत्रों में बिल्कुल विपरीत कहानियां हैं, जिनसे किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं है।

क्या था मामला और क्यों बरी हुए आरोपी?

दरअसल, 8 सितंबर 2006 को मालेगांव की हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान में जुमे की नमाज के बाद सिलसिलेवार धमाके हुए थे। इस आतंकी हमले में 31 बेगुनाह मारे गए थे और 312 लोग घायल हुए थे। आरोपियों पर हत्या, आपराधिक साजिश और यूएपीए (UAPA) जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। हाई कोर्ट ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। कोर्ट ने 2025 में निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश को भी रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि तत्कालीन न्यायाधीश ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला केवल परिस्थितियों पर आधारित था और कोई भी ऐसा गवाह नहीं था जिसने इन आरोपियों को घटनास्थल पर देखा हो।

ATS बनाम NIA: विरोधाभासों का जाल

शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस (ATS) ने की थी, जिसने 9 मुस्लिम युवकों को मालेगांव ब्लास्ट का साजिशकर्ता बताया था। एटीएस का दावा था कि उन्हें घटनास्थल से RDX के निशान और आपत्तिजनक साक्ष्य मिले थे। हालांकि, जब जांच NIA को सौंपी गई, तो पूरी कहानी बदल गई। NIA ने दक्षिणपंथी चरमपंथियों को जिम्मेदार ठहराया और स्वामी असीमानंद के बयानों के आधार पर नई चार्जशीट दाखिल की। बाद में असीमानंद ने अपना बयान वापस ले लिया, जिससे NIA का केस कमजोर पड़ गया।

अदालत ने टिप्पणी की कि NIA ने ATS की उस जांच को दरकिनार कर दिया जिसमें साजिश का विस्तृत विवरण था। आज स्थिति यह है कि 2008 के मालेगांव मामले में भी साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित जैसे आरोपी बरी हो चुके हैं, और अब 2006 के मामले में भी मुख्य आरोपी बाहर हैं।

मालेगांव ब्लास्ट का अपराधी कौन?

बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये चार आरोपी दोषी नहीं थे, और पहले गिरफ्तार किए गए 9 मुस्लिम युवक भी निर्दोष पाए गए, तो उन 31 परिवारों को न्याय कब मिलेगा जिन्होंने अपनों को खोया? मालेगांव की गलियों में आज भी यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर वह "अदृश्य हाथ" किसका था जिसने रिमोट दबाकर मालेगांव की शांति को भंग किया था।

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